रामनाम संकीर्तन से मिलती है सिद्धि और सार्थकता: पं. मिथिलेश नागर 

माहेश्वरी सेवासदन में नानी बाई को मायरो कथा का दूसरा दिन
उदयपुर। माहेश्वरी सेवासदन में माहेश्वरी परिवार की ओर से रविवार से आयोजित नानी बाई को मायरो कथा के दूसरे दिन सोमवार को कथावाचक डॉ. पं. मिथिलेश नागर ने कहा कि विकार मन में हो तो लक्ष्य नहीं मिलता। विकार मुक्त मन के लिए राम नाम संकीर्तन जरूरी है। रामनाम संकीर्तन से ही मिलती है सिद्धि और सार्थकता। उन्होंने भक्त शिरोमणि नरसी मेहता की भगवान के प्रति अटूट श्रद्धा, भक्ति और आस्था का वर्णन करते हुए बड़े भाई बंशीधर द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद बिटिया नानी बाई को ससुराल भेजने और फिर उसको पुत्री रत्न की प्राप्ति के बाद उसकी शादी के आयोजन तक की कथा के प्रसंग का वर्णन किया।

कथा प्रवचन के बीच पं. मिथिलेश नागर ने कहा कि एक बार राम बोलो तो संबोधन, दो बार बोलो तो अभिवादन, तीन बार बोलो तो संवेदना, बार बार बोलो तो संकीर्तन, कई बार संकीर्तन तो साधना और निरंतर साधना करो तो मिलती है सिद्धि और सार्थकता।

नरसी मेहता को घर से निकालना : नरसी मेहता अत्यन्त सरल, निष्कपट और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। वे सांसारिक कार्यों में मन न लगाकर दिन-रात भजन, कीर्तन और भगवान की भक्ति में लीन रहते थे।

उनकी पत्नी माणिक गौरी, पुत्र श्यामदास और पुत्री नानीबाई सहित उनका परिवार बड़े भाई बंशीधर के साथ रहता था। बंशीधर व्यवहारकुशल और धन कमाने वाले व्यक्ति थे, जबकि नरसी मेहता सांसारिक मोह-माया से दूर रहते थे।

घर के लोग नरसी मेहता को निकम्मा समझते थे। एक दिन विवाद बढ़ गया और बड़े भाई बंशीधर ने क्रोधित होकर नरसी मेहता को पत्नी और बच्चों सहित घर से निकाल दिया।

धर्मशाला में जीवन और पत्नी के ताने : घर से निकाले जाने के बाद नरसी मेहता अपने परिवार सहित एक धर्मशाला में रहने लगे। वहाँ भी वे कोई व्यापार या नौकरी नहीं करते थे। वे केवल श्रीकृष्ण का भजन करते और भगवान के नाम में मग्न रहते थे।

इस कारण उनकी पत्नी माणिक गौरी को परिवार की चिंता सताने लगी। कभी भोजन की कमी होती, कभी वस्त्रों की। दुखी होकर वे नरसी मेहता को ताने देतीं कि केवल भजन से घर नहीं चलता।

किन्तु नरसी मेहता का विश्वास अटल था। वे कहते —“जिसने संसार बनाया है, वही पालन भी करेगा।”

भगवान से प्रार्थना और अक्रूरजी का आगमन : एक दिन अत्यन्त दीन अवस्था में नरसी मेहता ने भगवान श्रीकृष्ण से करुण प्रार्थना की। भक्त की पुकार सुनकर भगवान द्रवित हो उठे।

भगवान ने अपने परम सेवक अक्रूरजी को भेजा। अक्रूरजी ने आकर नरसी मेहता के रहने के लिए सुंदर भवन की व्यवस्था कर दी। शीघ्र ही वहाँ सुख-सुविधाएँ दिखाई देने लगीं।

यह सब भगवान द्वारकाधीश की कृपा थी, परन्तु नरसी मेहता इसे अपनी नहीं बल्कि ठाकुरजी की महिमा मानते रहे।

नानीबाई को लेने पुरोहित का आगमन : नरसी मेहता की पुत्री नानीबाई का विवाह बाल्यकाल में ही बड़े भाई बंशीधर ने सम्पन्न कर दिया था। कुछ समय बाद ससुराल पक्ष से पुरोहित नानीबाई को विदा कराने आया।

माणिक गौरी अत्यन्त चिंतित हो गईं क्योंकि घर में न धन था, न वस्त्र, न आभूषण। उन्हें भय था कि बिना सम्मान के बेटी को विदा करना अपमानजनक होगा।

भगवान की महिमा और वैभवपूर्ण विदाई : भक्त की लाज रखने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अद्भुत लीला की। देखते ही देखते घर में नाना प्रकार के वस्त्र, आभूषण, धन, मिठाइयाँ और वैभव प्रकट हो गया। नानीबाई को राजकुमारी के समान सजाया गया। उत्तम वस्त्र, स्वर्णाभूषण, दास-दासी, बैलगाड़ियाँ और भेंट सामग्री देकर उसे ससुराल के लिए विदा किया गया। समय बीतने के साथ नानी बाई को पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई। मीडिया प्रवक्त हेमंत लड्ढा ने बताया कि नानी बाई का मायरा भरने की कथा का वर्णन मंगलवार को होगा।

प्रारंभ में और अंत में जगदीशलाल कचौड़ियां, जमनेश धुप्पड़ , जानकीलाल मूंदड़ा, श्यामसुंदर तोषनीवाल, लक्ष्मीनारायण भदादा, मुकेश मूंदड़ा, मुकेश मंत्री, नरेंद्रकुमार मंडोवरा, निरंजन लाल राठी, प्रदीप मूंदड़ा, प्रदीप हेड़ा ने आरती की। इस अवसर पर अतिथियों कल्लाजी धाम के महंत हेमंत जोशी, कुलपति सुखाड़िया विश्वविद्यालय कमल डागा, कैलाश मूंदड़ा, मुंबई के ओमप्रकाश हेड़ा का पं. मिथिलेश नागर ने सम्मान किया।

कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में डूब गए। आयोजन स्थल पर भजनों और भगवान कृष्ण के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

By Udaipurviews

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