-रासेश्वरी देवी जी आशीष वाटिका में श्रीमद्भागवत महापुराण के व्यावहारिक विज्ञान को सुनकर भावविभोर हुए शहर के प्रबुद्धजन
उदयपुर, 18 मई। ब्रज गोपिका सेवा मिशन के तत्वावधान में हिरण मगरी सेक्टर-13 स्थित आशीष वाटिकामें आयोजित नौ दिवसीय पंचम वेद श्रीमद्भागवत महापुराण ज्ञान रहस्य महोत्सव के द्वितीय दिन व्यासपीठ से जगद्गुरु उत्तम स्वामी श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका रासेश्वरी देवी जी ने जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को उजागर किया। इससे पूर्व सत्र की शुरुआत मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन और भागवत आरती से हुई। पूजनीया मां ने उदयपुर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्ष 2006 में वे पहली बार यहाँ आई थीं और आज पूरे 20 वर्ष पूर्ण होने पर भी यहां के श्रोताओं का प्रेम और अनन्य निष्ठा वैसी ही बनी हुई है।
व्यासपीठ से तार्किक विश्लेषण करते हुए देवी जी ने बताया कि श्रीमद्भागवत कोई साधारण ग्रंथ या कथा की किताब नहीं, बल्कि दुखों को जड़ से मिटाने वाला अचूक व्यावहारिक मैनुअल है। उन्होंने औषधि और रसायन का वैज्ञानिक अंतर समझाते हुए कहा कि औषधि बीमार होने के बाद रोग दूर करती है, लेकिन रसायन व्यक्ति में ऐसी प्रतिरोधक क्षमता लाता है कि वह बीमार ही न पड़े। शौनकादिक ऋषियों के लिए भागवत एक रसायन है जो सांसारिक विकारों के संक्रमण से बचाती है, जबकि मृत्यु के मुहाने पर खड़े राजा परीक्षित के लिए यह भव-औषधि बनी, जो कानों के रास्ते पी जाती है और कड़वी नहीं बल्कि परम मधुर है।
प्रवचन के दौरान देवी जी ने देवताओं के अहंकार का एक अत्यंत अनूठा प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि जब सुखदेव जी परीक्षित को भागवत सुनाने बैठे, तो इंद्र आदि देवता स्वर्ग का अमृत कलश लेकर आए और व्यापार करने की कोशिश की कि परीक्षित को यह अमृत पिलाकर अमर कर दो और हमें कथा-अमृत दे दो। सुखदेव जी ने देवताओं को अभक्त कहकर डांट दिया और भगा दिया, क्योंकि देवताओं का अमृत केवल दीर्घ-जीवी (लंबी आयु) बना सकता है, लेकिन भागवत का कथा-अमृत जीव को दिव्य-जीवी और अभय बनाता है। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में केवल धन कमाना या उदर-पोषण ही पुरुषार्थ नहीं है, बल्कि एकांत में बैठकर स्वयं को जानना और विवेकपूर्ण आचरण करना ही असली सफलता है।
दिव्य प्रसंग के विश्राम पर जब पूजनीया मां ने अपने मधुर स्वर में जगद्गुरु कृपालु जी महाराज द्वारा रचित पद बॉट निहारी तिहारी पल पल, कल समान जन है…और श्यामा श्याम नाम रूप लीला गुण धामा…का संकीर्तन कराया, तो पूरा पंडाल अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान की विरह-वेदना में डूब गया। इसके पश्चात जब श्रीमद्भागवत महापुराण की भव्य महाआरती उतारी गई, तो संपूर्ण आशीष वाटिका परिसर शंख ध्वनि, करतल ध्वनि और अलौकिक तरंगों से सराबोर हो उठा। महाआरती के इस दिव्य क्षण में उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु का हृदय परम शांति और आनंद की अनुभूति से भर गया।
भागवत महापुराण प्रवचन श्रृंखला प्रतिदिन सायंकाल 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक आशीष वाटिका, हिरण मगरी सेक्टर-13, उदयपुर में आयोजित की जा रही है और यह 25 मई तक जारी रहेगी।
सांसारिक चिंता जीव को ईश्वर से दूर करती है और पारमार्थिक चिंता प्रभु के समीप लाती है
