उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में सोमवार को आयोजित नियमित प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को आत्मचिंतन, स्वदोष दर्शन और आत्मकल्याण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद सभी जीवों के प्रति प्रेम और कल्याण की भावना रखी। उनका संदेश था कि प्रत्येक जीव अपनी आत्मदशा का स्वयं मालिक बने। हृदय में आत्मकल्याण की सच्ची प्यास जाग जाए तो व्यक्ति संसार में रहते हुए भी संसार से निर्लिप्त होकर आत्मचेतना को प्राप्त कर सकता है।
साध्वीश्री ने कहा कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी आवश्यकता और प्यास से तय होता है। उन्होंने राजा और एक गिलास पानी की प्रेरक कथा सुनाते हुए समझाया कि जब जीवन पर संकट हो तो एक गिलास पानी की कीमत पूरे राज्य से भी अधिक हो सकती है। इसलिए कीमत पानी की नहीं, बल्कि प्यास की होती है। इसी प्रकार जमीन का मूल्य भी उसके स्थान से अधिक उसकी मांग के आधार पर निर्धारित होता है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा हमारे भीतर आत्मकल्याण की प्यास जगाना चाहते हैं। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अनमोल है, इसलिए हमें अपने दोषों और विकारों का निवारण स्वयं के भीतर से करना चाहिए। जिस प्रकार कपड़ों पर लगे दाग को हटाने के लिए हम तुरंत प्रयास करते हैं, उसी प्रकार आत्मा पर लगे विकारों को दूर करने की भी चिंता करनी चाहिए।
साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य दूसरों के दोष देखने और उनकी निंदा करने में सहज ही आगे रहता है, लेकिन अपने दोषों को देखने से बचता है। परदोष दर्शन के बजाय स्वदोष दर्शन को जीवन का आधार बनाएं। अपने भीतर झांकने से परनिंदा से भी बचेंगे और आत्मशुद्धि का मार्ग भी प्रशस्त होगा। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।
‘जिसे आत्मकल्याण की प्यास, वही संसार से निर्लिप्त’: साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
