साहित्य की समृद्धि के लिए परदेशी के आदर्शों पर चलने का लिया संकल्प
प्रतापगढ़, 29 जुलाई। साहित्यकार परदेशी की 103वीं जयंती के अवसर पर शहर स्थित परदेशी पार्क में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों ने परदेशी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों ने परदेशी के साहित्यिक योगदान को स्मरण करते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर कवि हरीश व्यास ने कहा कि परदेशी का जीवन नई पीढ़ी के साहित्यकारों के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि मात्र नौ वर्ष की आयु में लेखन प्रारंभ करना और चौदह वर्ष की आयु में ‘चित्तौड़’ जैसा खंडकाव्य प्रकाशित कर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जैसी विभूति से प्रशंसा प्राप्त करना उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि इतनी कम आयु में साहित्य साधना का जो उदाहरण परदेशी ने प्रस्तुत किया, वह आज भी युवाओं को सृजन के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का सशक्त साधन है और परदेशी ने अपने संपूर्ण जीवन में इसी भावना को आत्मसात किया।
सुरेंद्र सुमन ने कहा कि परदेशी हिन्दी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में रहे, जिन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान बनाई। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद और यशपाल के बाद उनकी रचनाओं का सर्वाधिक भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना इस बात का प्रमाण है कि उनका साहित्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे देश के पाठकों के मन तक पहुंचा। उन्होंने कहा कि परदेशी ने अपने उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ, इतिहास, मानवीय संवेदनाओं और राष्ट्रीय चेतना का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण किया। उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना अपने समय में था।
राजेंद्र जोशी ने कहा कि परदेशी बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उन्होंने केवल उपन्यास ही नहीं, बल्कि कविता, कहानी, नाटक, बाल साहित्य, राजनीति, धर्म-दर्शन, निबंध तथा अनुवाद जैसी लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाधर्मिता का विस्तार इस बात का परिचायक है कि वे समाज के प्रत्येक वर्ग तक साहित्य पहुंचाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि साहित्य के प्रति उनका समर्पण और निरंतर सृजनशीलता आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बनी रहेगी।
कुंवर प्रताप सिंह ने कहा कि परदेशी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपन्यास हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि ‘जय महाकाल’ जैसे कालजयी उपन्यास को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित किया जाना उनकी साहित्यिक उत्कृष्टता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि परदेशी ने अपने साहित्य के माध्यम से भारतीय इतिहास, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रभावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी रचनाएं केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठकों को अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का कार्य भी करती हैं।
अरुण वोरा ने कहा कि परदेशी का जीवन संघर्ष, समर्पण और साहित्य साधना का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कहा कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने साहित्य का मार्ग नहीं छोड़ा। साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन, प्रकाशन तथा लेखन उनके जीवन का ध्येय रहा। उन्होंने कहा कि निजी संघर्षों के बीच भी साहित्य को सर्वोच्च स्थान देना उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी। ऐसे साहित्यकार विरले ही जन्म लेते हैं, जिनका संपूर्ण जीवन साहित्य और समाज के लिए समर्पित हो।
भंवर ‘भंवर’ ने कहा कि परदेशी का साहित्य मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और राष्ट्रीय मूल्यों का सशक्त दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि वे केवल लेखक नहीं, बल्कि समाज को नई सोच देने वाले चिंतक भी थे। उनके साहित्य में आमजन के जीवन, संघर्ष, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का जीवंत चित्रण मिलता है। उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी परदेशी के साहित्य का अध्ययन करे, उनके विचारों को आत्मसात करे तथा साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प ले। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
