उदयपुर, 12 सितम्बर। नारायण सेवा संस्थान में अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा में भगवान जगन्नाथ की महिमा, राजा इन्द्रद्युम्न की भक्ति और भक्त सालबेग के मार्मिक प्रसंगों के माध्यम से भक्ति की शक्ति का वर्णन किया गया। उन्होंने कहा कि भगवान जगन्नाथ केवल मंदिर के देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के नाथ हैं। सच्ची श्रद्धा के सामने जाति, वर्ग और बाहरी भेद की दीवारें स्वतः मिट जाती हैं।
कथा में बताया कि धर्मात्मा राजा इन्द्रद्युम्न के मन में भगवान के दिव्य स्वरूप के दर्शन की तीव्र अभिलाषा थी। नीलमाधव के बारे में जानकारी मिलने पर उन्होंने विद्यापति सहित अपने दूतों को उनकी खोज के लिए भेजा। विद्यापति ने वन में विश्वावसु के माध्यम से नीलमाधव के दर्शन किए और इसकी सूचना राजा को दी। राजा स्वयं दर्शन के लिए पहुंचे, लेकिन तब तक भगवान अंतर्धान हो चुके थे। देवर्षि नारद ने उन्हें समझाया कि यह अंत नहीं, बल्कि भगवान की नई लीला का प्रारंभ है।
इसके बाद समुद्र तट पर दिव्य काष्ठ प्राप्त हुआ, जिसे परंपरा में ‘दारु-ब्रह्म’ कहा गया। इसी काष्ठ से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र जी और माता सुभद्रा के विग्रहों की स्थापना हुई। अग्रवाल ने कहा भगवान का यह अनूठा स्वरूप उनकी इच्छा और दिव्य लीला का प्रतीक है। राजा इन्द्रद्युम्न ने मंदिर का निर्माण करवाकर विधिपूर्वक तीनों विग्रहों की प्रतिष्ठा कराई।
भगवान के भक्तों के बीच आने की इसी लीला से रथयात्रा की परंपरा जुड़ी। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र जी का तालध्वज और माता सुभद्रा का दर्पदलन रथ भक्तों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। रथयात्रा में गजपति महाराज द्वारा निभाई जाने वाली ‘छेरा पहँरा’ परंपरा यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा और सामान्य भक्त सभी समान हैं। भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।
कथा में भक्त सालबेग का प्रसंग विशेष रूप से भावपूर्ण रहा। मंदिर में प्रवेश का अधिकार न होने के बावजूद भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी श्रद्धा अटूट थी। वे रथयात्रा के माध्यम से भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा करते थे। लोकश्रुति के अनुसार, एक बार जब सालबेग पुरी पहुंचने में विलंब कर रहे थे, तब भगवान जगन्नाथ का रथ आगे नहीं बढ़ा। सालबेग के पहुंचकर दर्शन करने के बाद ही रथ आगे चला। यह प्रसंग इस भाव को प्रकट करता है कि भगवान के लिए भक्त की निष्कपट भावना ही सर्वोपरि है।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि भगवान जगन्नाथ की भक्ति हमें सिखाती है कि भगवान तक पहुंचने के लिए वैभव, आडंबर या बाहरी साधनों से अधिक जरूरी निष्कपट श्रद्धा, पूर्ण समर्पण और सच्चा भाव है। जब मन में भेदभाव नहीं और भावना में छल नहीं होता, तब भक्ति स्वयं भगवान तक पहुंचने का मार्ग बन जाती है। यही जगन्नाथ भक्ति का मूल संदेश है।
इस दौरान प्रशांत अग्रवाल ने नारायण सेवा संस्थान से कृत्रिम अंग प्राप्त करने वाले लाभान्वित दिव्यांगजनों से संवाद किया और उनके अनुभव जाने।
