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उदयपुर। किसी भी हादसे में गंभीर घायल होने वाले इंसान को गोल्डन आॅवर में तत्काल इलाज उसके लिए जीवनरक्षक होता है और कम समय में पूरा इलाज पॉलीट्रॉमा केयर में ही संभव है जहां उपस्थित प्रत्येक विशेषज्ञ चिकित्सकों के सामूहिक प्रयासों से कम समय में प्राथमिक तय करते हुए इलाज होता है। घायल की मल्टीपल इंजरी की गंभीरता को देखते हुए पारस हैल्थ उदयपुर में पॉलीट्रॉमा केयर यूनिट चौबीस घंटे तैयार रहती है। पारस हैल्थ उदयपुर के एक्सपर्ट पैनल के सदस्य ऐनेस्थिसियोलॉजिस्ट डॉ नितिन कौशिक, न्यूरोसर्जरी कंसल्टेंट डॉ एसआर चौधरी, आॅर्थोपेडिक्स सीनियर कंसल्टेंट डॉ राहुल खन्ना, आॅर्थोपेडिक्स एचओडी डायरेक्टर डॉ सीके आमेटा, कंसल्टेंट डॉ आशीष सिंघल, न्यूरोलॉजी सीनियर संकल्टेंट डॉ तरुण माथुर, डॉ मनीष कुलश्रेष्ठ, न्यूरोसर्जरी एचओडी डायरेक्टर डॉ अजीत सिंह, लेप्रोस्केपिक सर्जन डॉ अभिषेक व्यास, प्लास्टिक सर्जन डॉ सुमित सिंघल ने पत्रकारों को पॉलीट्रोमा यूनिट की कार्यशैली, विशेषता के बारे में बताया कि पॉलीट्रॉमा ऐसी गंभीर स्थिति होती है, जिसमें शरीर के कई अंगों को क्षति पहुंची होती है। ऐसे मरीजों की जान बचाने में स्पेशलाइज्ड ट्रॉमा केयर अहम भूमिका निभाती है। इसमें घायल को इमरजेंसी डॉक्टरों, ट्रॉमा सर्जनों, न्यूरोसर्जनों, ऑर्थोपेडिक सर्जनों, क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्टों, एनेस्थिसियोलॉजिस्टों, रेडियोलॉजिस्टों और रिहैबिलिटेशन एक्सपर्ट्स सामूहिक इलाज प्राथमिकता अनुसार करते है। जल्दी से डायग्नोसिस, स्टैंडर्ड ट्रॉमा प्रोटोकॉल का पालन, ज़रूरत पड़ने पर तुरंत सर्जिकल इंटरवेंशन और गोल्डन आवर, यानी चोट लगने के बाद पहले घंटे में पूरी क्रिटिकल केयर से बचने की दर और फंक्शनल रिकवरी में काफ़ी सुधार होता है। डॉ आशीष सिंघल ने बताया कि हर इंजरी की अपनी गंभीरता होती है और उसी प्राथमिकता अनुसार पॉलीट्रोमा में इलाज होता है ताकि बिना दिक्कत मरीज को जल्द ठीक कर छुट्टी दे सके। डॉ अजीत सिंह ने बताया कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम गोल्डन आॅवर में घायल का इलाज कर जीवन रक्षा करती है। इसमें विशेषज्ञ चिकित्सकों का आपसी समन्वय होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि घायल को तत्काल प्राथमिक उपचार दिलाना जरुरी है। इससे उसके बचने की उम्मीद बढ जाती है।
डॉ अजीत सिंह ने बताया कि दुनिया में प्रतिवर्ष करीब 12 लाख और भारत में सवा लाख लोगों की गंभीर घायल अवस्था में समय पर उपचार नहीं मिलने से मृत्यु हो जाती है। प्लास्टिक सर्जन डॉ सुमित सिंघल ने बताया कि क्षतिग्रस्त हड्डी पर समय पर मांस चढा देने से उसकी 2—3 दिन में रिकवरी हो जाती है। हादसे में अंग भंग होने पर कटे हुए हिस्से को एयरटाइट पॉलीपेक में रख ठंडे वातावरण में रखकर तत्काल हॉस्पिटल पहुंचने पर उसे वापस शरीर से जोडना संभव है। जनरल सर्जन डॉ अभिषेक व्यास ने बताया कि हादसे में पेट में छोटी मोटी ब्लीडिंग का तत्काल पता नहीं चलता। एक दो दिन बाद पेट फुलने पर पता चलता है जो सीटी स्केन में सामने आता है। फैसिलिटी डॉयरेक्टर अनुभव सुखवानी ने बताया कि ट्रॉमा केयर समय के ख़िलाफ़ एक लड़ाई जैसा होता है क्योंकि इसमें हर एक सेकेंड मायने रखता है। स्पेशल ट्रॉमा सेंटर में जल्दी इलाज से जान बच सकती है और लंबे समय तक विकलांगता का खतरा कम हो सकता है। प्रेसवार्ता में मार्केटिंग हैड डॉ वैशाली बोडेले, वैशाली पालीवाल भी उपस्थित रही।
घायल को गोल्डन आॅवर में तत्काल इलाज जीवनरक्षक, पॉलीट्रॉमा केयर खास
