उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने शुक्रवार को कहा कि परमात्मा महावीर ने प्रबल एवं प्रचंड पुरुषार्थ के माध्यम से केवलज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में दो प्रकार की आंखें होती हैंकृबहिरचक्षु और अंतरचक्षु। बहिरचक्षु से व्यक्ति संसार को देखता है, जबकि अंतरचक्षु खुलने पर वह अपने भीतर की यात्रा कर वास्तविक आनंद का अनुभव करता है।
साध्वी श्री ने कहा कि बाहर की वस्तुओं से मिलने वाला आनंद क्षणिक होता है, जबकि अंतरचक्षु से प्राप्त आनंद शाश्वत होता है। मनुष्य जब बाहरी वस्तुओं और सुविधाओं में सुख तलाशता है तो उसका सुख परिस्थितियों पर निर्भर हो जाता है। वहीं आत्मा की ओर मुड़ने पर मिलने वाला आनंद किसी बाहरी वस्तु का मोहताज नहीं रहता।
सुख की वास्तविक परिभाषा समझाते हुए साध्वी विद्युतप्रभा ने कहा कि सच्चा सुख वही है जो स्वाधीन हो। उन्होंने उदाहरण दिया कि परीक्षा में प्रथम आने पर पिता बच्चे को उपहार स्वरूप बाइक दे दें, लेकिन उसकी चाबी अपने पास रखें तो बाइक मिलने के बावजूद बच्चे का सुख पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं होगा। जिस सुख पर किसी दूसरे का नियंत्रण हो, वह वास्तविक सुख नहीं है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने संसार को दुखरूप बताया है। संसार में वस्तु की प्राप्ति हो या उसका परिणाम, यदि वह पराधीन है तो अंततः दुख का कारण बन सकता है। इसलिए मनुष्य को क्षणिक सुख के बजाय आत्मिक एवं स्थायी आनंद की ओर बढ़ना चाहिए।
साध्वी श्री ने कहा कि मनुष्य आयुष्य, मनुष्य जन्म, मकान, धन-संपत्ति और विभिन्न सुविधाओं को सुख मानता है, लेकिन उसे विचार करना चाहिए कि यह सुख वास्तव में स्वतंत्र है या परतंत्र। उन्होंने कहा कि मनुष्य का शरीर भी कर्मों के अधीन है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि चलते-चलते रक्त संचार में गड़बड़ी हो सकती है, अचानक हृदयाघात आ सकता है, रक्तचाप कम होने से पैरालिसिस जैसी स्थिति बन सकती है। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति अपने शरीर का संचालन भी अपनी इच्छा के अनुसार नहीं कर पाता। जब शरीर पर ही हमारा पूर्ण अधिकार नहीं है तो शरीर से मिलने वाला सुख स्वतंत्र कैसे हो सकता है।
साध्वी विद्युतप्रभा ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है, लेकिन वास्तविक स्वतंत्रता केवल सांसारिक बंधनों से दूर रहने में नहीं है। सच्ची स्वतंत्रता मन, इच्छाओं और कर्मों पर विजय प्राप्त करने में है। जब व्यक्ति बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठकर अंतरचक्षु को जागृत करता है, तभी वह शाश्वत सुख और आत्मिक आनंद की ओर अग्रसर होता है।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
अंतरचक्षु खुलने पर मिलता है शाश्वत आनंद, पराधीन सुख वास्तव में दुखःसाध्वी विद्युतप्रभा
