आठवें उदयपुर फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत मदुराई के दस्तावेज़ी फ़िल्मकार अमुधन रामलिंगम पुष्पम द्वारा चयन की गई सामजिक न्याय की 4 फिल्मों के प्रदर्शन से हुआ।
उदयपुर। आरएनटी मेडिकल कॉलेज के एनएलटी सभागार में चल रहे 8वें उदयपुर फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन 1 अक्टूबर के प्रातः कालीन सत्र में चेन्नई के फिल्म कलेक्टिव मरूपक्कम के क्यूरेटर अमुधन द्वारा संग्रहित की गई चार लघु फिल्मों को दिखाया गया ।पहली फ़िल्म ‘आज स्कूल जावा नू छे’ में डूंगरपुर के गांवों में चल रहे सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों और छात्र छात्रा के बीच अभावग्रस्त वातावरण में शिक्षा को लेकर किए जा रहे प्रयासों को लेकर एक धीमी और गहरी फिल्म है। फिल्म के बाद हुई चर्चा में एक शिक्षक ने बताया की ये उनके जीवन के अनुभव को व्यक्त करती है और उन्होंने कई स्तरों पर फिल्म में अभिव्यक्त पीड़ा को महसूस किया ।
अमूधन के इस चतुर्दिक गुच्छे में अहमद बिलाल द्वारा निर्देशित ‘बागपत के बागी’ दूसरी फिल्म रही जिसमे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लड़कियां शूटिंग का खेल सीखती हैं। ये उनके संघर्षों की कहानी है जो घरेलू हिंसा, जातिगत प्रवंचना और पुरुषवादी सत्ता जैसे कई दृष्टिकोण को आगे करती है.
‘यह मेरा घर’ फिल्म के बाद कई दर्शकों के आंसू आ गए। हालांकि इस फिल्म पर चर्चा यह भी रही की ये सांप्रदायिकता के मुद्दे पर हिंसक और आक्रामक समाज को कैसे बदल पाएगी। ये विस्थापन और राज्य प्रायोजित हिंसा इन दोनो मुद्दो को उठाती है । यह फिल्म मुख्यत फेरी द्वारा देश के कोने कोने में कपड़ा बेचने वाले परिवारों के जीवन में निरंतर अंlतरिक विस्थापन के रंग दिखाती है । उनका ये संघर्ष उनकी मुस्लिम पहचान और साम्प्रदायिक हिंसा के माहौल में ओझल होते स्नेह भरे संबंधों और आत्मीयता को लेकर भी है और कुतबा गांव के खंडहर घरों की स्थांतरित ईंटो के बीच से झांकती पीली रोशनी और जंगली घास की विरासत को लेकर जिंदगी में आगे बढ़ने का भी है ।
इस सत्र की आखिरी फिल्म ‘दे आर डाइंग’, राजस्थान की एक लुप्त होती भाषा धावरी पर केंद्रित रही। इस फ़िल्म में भाषाओं के मौखिक इतिहास और लोक रूप में संस्कृति की सहज संभाल में भाषा के महत्व पर बात रही । फिल्म प्रदर्शन के बाद हुई बातचीत में दर्शकों ने शिक्षा, राज्य प्रायोजित हिंसा, भाषा और विस्थापन को लेकर लंबी बातचीत हुई जिसमे शिक्षकों, विद्यार्थियों, फिल्म निर्देशक और कलाकार शामिल हुए।
दुपहर का सत्र देबालिना की दस्तावेज़ी फिल्म ‘एंड द अनक्लेम्ड’ से हुई। जैसे -जैसे भारतीय राजनीति में विविधता कम होती जा रही है वैसे -वैसे वैसे -वैसे सामाजिक ताने -बाने से सतरंगी छटा कमजोर होती जा रही है। फिर ऐसी पहचान और आवाज़ें जो लीक से हटकर हैं , उनका तो जीना ही मुश्किल। फ़ीचर लम्बाई की दस्तावेज़ी फ़िल्म ‘ and the unclaimed’ ऐसी ही बातों को अपना केंद्रीय विषय बनाती है। फ़िल्मकार देबलिना पश्चिम बंगाल के देश-काल में घट रही कहानियों को अपने विमर्श का हिस्सा बनाती हैं और अपने चरित्रों के बहाने जीवन जीने के इस फ़लसफ़े पर सार्थक बहस छेड़ने में कामयाब हुई हैं। यह फ़िल्म सतरंगी जीवन की संभावनाओं और उसकी दुश्वारियों पर एक ऐसे सिनेमा निबंध की तरह है जिसे पढ़ने की हमें बार -बार जरुरत महसूस पड़ती है. फिल्म की टीम मेंबर नबदीपा के साथ दर्शकों की आत्मीय बातचीत ने सतरंगी जीवन की दुश्वारियां और संभावनाओं की एक नई दुनिया खोली।
दूसरे दिन के आयोजन का एक और आकर्षण ‘द मूकनायक’ की संस्थापक मीना कोतवाल के काम को जानना था जिससे हमें हाशिये की पत्रकारिता के बारे बहुत सी नै बातें पता चलीं।
दूसरे दिन का एक और मुख्य आकर्षण युवा नृत्यांगना प्रियाक्षी अग्रवाल की नृत्य प्रस्तुति ‘नंगा कपड़ा’ थी जिसमें उन्होंने नृत्य प्रदर्शन और प्रतिरोध को एक साथ लेकर कपड़ा पहनने की राजनीति किस तरह मॉरल पुलिसिंग को बढ़ावा देती है और यौनिक हिंसा के भी रास्ते खोलती है । उन्होंने नृत्य प्रदर्शन प्रस्तुति की सामान्य अवधारणा को तोड़ते हुए पूरे सभागार को ही अपना मंच बना लिया और इस तरह अपनी बात में दर्शकों को भी सहज व आत्मीय तरह से शामिल कर लिया।
प्रतिरोध का सिनेमा के 8वें उदयपुर फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की आखिरी फ़िल्म के रूप में प्रभाष चंद्रा की आई एम नॉट द रिवर झेलम दिखाई गई । इस फिल्म की युवा नायिका अफीफा एक कश्मीरी युवती है । फिल्म में अफीफा जहां एक ओर लगातार दमघोंटू और दर्दनाक अनुभवों से गुजरती है , वहीं दूसरी ओर फिल्म ने अनिश्चितता और दर्द के वातावरण को भी महसूस कराया। अफीफा के साथ चलते चलते यह फिल्म कश्मीर में चल रहे विभिन्न ताकतों के बीच की समीकरणों को उजागर करती है ।
