कृष्णमय हुआ प्रताप गौरव केंद्र

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शुरू हुआ तीन दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेला महोत्सव

उदयपुर, 4 सितम्बर। प्रताप गौरव केंद्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ में शुक्रवार से भक्ति, उल्लास और सांस्कृतिक सरोकारों से ओतप्रोत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मेला महोत्सव का शुभारंभ हुआ। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति, उदयपुर के अंतर्गत संचालित प्रताप गौरव केंद्र में आयोजित यह तीन दिवसीय महोत्सव 6 सितंबर तक चलेगा। महोत्सव के शुभारंभ के साथ ही पूरा परिसर कृष्ण भक्ति, लोक संस्कृति और उत्सवी उल्लास से परिपूर्ण नजर आया।

प्रताप गौरव केंद्र के निदेशक अनुराग सक्सेना ने बताया कि महोत्सव का शुभारंभ शुक्रवार सुबह 6 बजे पंचामृत अभिषेक के साथ हुआ। इस धार्मिक अनुष्ठान में 45 जोड़ों ने श्रद्धापूर्वक सहभागिता की। वैदिक परंपराओं और भक्तिमय वातावरण के बीच हुए अभिषेक से महोत्सव की मंगल शुरुआत हुई।

दोपहर से मेला प्रारंभ हुआ। मेले में खान-पान के साथ हस्तशिल्प, धार्मिक एवं सामाजिक साहित्य तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के विविध स्टॉल सजाए गए हैं। आकर्षक झूलों और मनोरंजक प्रस्तुतियों ने मेले की रौनक को और बढ़ा दिया है। विशेष रूप से बच्चों के लिए मेला आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। शाम होते-होते बड़ी संख्या में शहरवासी मेले में पहुंचे और विभिन्न गतिविधियों का आनंद लिया।

नन्हे कान्हाओं ने मोहा मन-महोत्सव के सहसंयोजक हिम्मत सिंह ने बताया कि शुक्रवार दोपहर बच्चों के लिए विशेष वेशभूषा प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। पांच वर्ष तक के नन्हे प्रतिभागियों के लिए आयोजित कान्हा-यशोदा वेशभूषा प्रतियोगिता में बच्चों ने कृष्ण और यशोदा के मनोहारी स्वरूप धारण कर सभी का मन मोह लिया।

प्रतियोगिता में किंशु सुथार ने प्रथम, वेदिका राव ने द्वितीय और युविका श्रीमाली ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। वहीं देवांश को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया।

इसी क्रम में 6 से 12 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए राधा-कृष्ण वेशभूषा प्रतियोगिता आयोजित हुई। इसमें कृतिका, वेदिका और युविका संयुक्त रूप से प्रथम रहीं। लक्षिका त्रिवेदी ने द्वितीय और सायशा भटनागर ने तृतीय स्थान प्राप्त किया, जबकि प्रियांशी गरासिया को सांत्वना पुरस्कार दिया गया।

प्रतियोगिता के दौरान नन्हे प्रतिभागियों का राधा-कृष्ण के मनमोहक स्वरूप में सुसज्जित होकर मंच पर उतरना विशेष आकर्षण रहा। उनकी भाव-भंगिमाओं और पारंपरिक वेशभूषा ने वातावरण को मानो ब्रज की गलियों जैसा रंग दे दिया। प्रतियोगिता में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाश डागा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में गौरव नागर, राकेश ओझा, दिनेश तेली, सौरभ श्रीमाली, प्रद्युम्न, यशवन्त मंडावरा, दिलीप, प्रकाश साहू, तुषार पालीवाल, गेहरीलाल आदि उपस्थित रहे।

दूसरे प्रयास में फोड़ी मटकी-सहसंयोजक जसवंत सिंह पुण्डीर ने बताया कि शाम को मटकी फोड़ प्रतियोगिता का क्रम शुरू हुआ। हाथी घोड़ा पालकी — जय कन्हैयालाल की के लगातार जयघोष के साथ युवाओं ने मटकी फोड़ने का प्रयास शुरू किए। पारम्परिक मटकी फोड़ प्रतियोगिता में मेवाड़ क्लब श्री एकलिंगनाथ जी टीम कुम्हारवाड़ा (सीनियर) टीम विजेता रही। उन्होंने पांच मंजिला पिरामिड बनाते हुए दूसरे प्रयास में एक मिनट 25 सेकंड में मटकी फोड़ दी। मटकी 25 फीट ऊंची थी। इसमें आठ टीमें थीं। विजेता टीम को 51 हजार का पुरस्कार दिया गया।

नवाचार वाली दही—हांडी प्रतियोगिता में 18 फीट ऊंची बंधी मटकी फोड़ने तीन टीमें पहुंचीं। इनमें भी मेवाड़ क्लब श्री एकलिंगनाथ जी टीम कुम्हारवाड़ा (जूनियर) टीम ने बाजी मारी। उन्होंने 17 मिनट 19 सेकंड में मटकी फोड़ी। दूसरे नंबर बजरंग क्लब की टीम रही जिसने 49 मिनट 34 सेकंड में मटकी फोड़ी। तीसरे नंबर पर मोमाई मां टीम ने 59 मिनट में मटकी फोड़ी। नवाचारयुक्त इस प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार 11 हजार रुपये, द्वितीय 5100 रुपये, तृतीय 2100 रुपये तथा सांत्वना पुरस्कार 1100 रुपये प्रदान किया गया। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अध्यक्ष प्रो. भगवतीप्रकाश शर्मा, महामंत्री दीपक शुक्ला, रवीन्द्रनाथ टैगोर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राहुल जैन ने विजेता दलों को पुरस्कार प्रदान किए।

आज झांकी, लहरिया और नाव मनोरथ-पालक अधिकारी पंकज पालीवाल ने बताया कि 5 सितंबर को महोत्सव की सांस्कृतिक आभा और अधिक गहरी होगी। प्रातः 9 बजे से झांकी प्रतियोगिता आयोजित होगी, जिसमें कृष्ण की लीलाओं और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रसंगों की कलात्मक अभिव्यक्ति देखने को मिलेगी। दोपहर 12 बजे से लहरिया उत्सव होगा, जो राजस्थान की रंग-बिरंगी लोक परम्परा को जीवंत करेगा। शाम 4 से 7 बजे तक नाव मनोरथ का आयोजन होगा, जबकि रात 8 बजे से भजन संध्या में भक्ति संगीत की स्वर-लहरियां वातावरण को आध्यात्मिक रंग देंगी।

गवरी के साथ होगा महोत्सव का समापन-6 सितंबर को प्रातः 9 बजे से पारम्परिक गवरी आयोजन होगा। मेवाड़ की लोकनाट्य एवं आदिवासी सांस्कृतिक परम्परा से जुड़ी गवरी की प्रस्तुति महोत्सव के अंतिम दिन को विशिष्ट लोक-रंग प्रदान करेगी।

By Udaipurviews

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