भीलवाड़ा, 10 फरवरी। अनुसंधान निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा प्रायोजित अनुसूचित जनजाति योजनान्तर्गत बकरी पालन द्वारा उद्यमिता विकास विषय पर 15 दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कृषि विज्ञान केन्द्र के गोदित गाँव मांडल पंचायत समिति के सज्जनपुरा में आयोजित किया गया।
केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी.एम. यादव ने बताया कि बकरी पालन भूमिहीन, लघु एवं सीमांत किसानों के जीवन निर्वाह का प्रमुख स्त्रोत है। डॉ. यादव ने बकरियों की प्रमुख नस्लें सिरोही, सोजत, गूजरी, करौली, मारवाड़ी, झकराना, परबतसरी एवं झालावाड़ी में आवास एवं आहार प्रबन्धन, प्रमुख रोग एवं निदान, कृमिनाशक, बाह्य परजीवी नियन्त्रण की जानकारी से लाभान्वित किया और बकरी पालन को किसान के लिए एटीएम एवं चलता फिरता फ्रीज बताया।
प्रोफेसर शस्य विज्ञान डॉ. के.सी. नागर ने बकरी पालन के लिए स्थान का चयन, शेड का निर्माण, बकरियों की संख्या का नियंत्रण, वर्ष भर हरा चारा उत्पादन, बकरी के दूध की उपयोगिता एवं विपणन के बारे में बताया।
सुवाणा पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेन्द्र पारडे ने बकरियों में होने वाले संक्रामक रोग उनके फैलने के कारण और निदान की जानकारी दी। पशुपालन वैज्ञानिक डॉ. हीरा लाल बुगालिया ने कृषक उत्पादक संगठन से जुड़कर बकरी पालन अपनाने के बारे में जानकारी दी।
सहायक कृशि अधिकारी श्री नन्द लाल सेन ने बकरी पालन को कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय बताया जिसे किसान छोटे स्तर से बड़े स्तर तक आसानी से किया जा सकता है। वरिश्ठ अनुसंधान अध्येता श्री प्रकाश कुमावत ने बकरियों में होने वाले प्रमुख रोग एवं टीकाकरण के बारे में बताया। इस अवसर पर बकरी पालकों को विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित कृशि कलैण्डर एवं प्याज की पौध दिये गये। प्रशिक्षण में 30 कृषि एवं कृषक महिलाओं ने भाग लिया।
