उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के चौथे दिन सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं की उपस्थिति में भव्य धर्मसभा हुई। साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन का संदेश देते हुए कहा कि पर्युषण केवल धार्मिक क्रियाओं का पर्व नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर झांकने और जीवन की दिशा का मूल्यांकन करने का अवसर है।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि पर्युषण के तीन दिन बीत चुके हैं, अब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं से पूछे कि उसने इन दिनों में क्या पाया। मनुष्य का जीवन अत्यंत मूल्यवान है और इसमें बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन व्यक्ति दुकान, मकान और फैक्ट्री बनाने को ही उपलब्धि मानकर सांसारिक उलझनों में फंस जाता है। हमें विचार करना चाहिए कि हमने परमात्मा की दृष्टि से पाने योग्य पाया है या छोड़ने योग्य।
उन्होंने कहा कि सरलता, नम्रता, विनय, समता, तप, त्याग और सहिष्णुता जैसे गुण ही वास्तविक जीवन की संपदा हैं। परमात्मा की चरण सेवा अत्यंत दुर्लभ है। तलवार की धार पर चलना भी सरल हो सकता है, लेकिन परमात्मा के प्रति सच्चा समर्पण और चरण सेवा कठिन है। जिन अंगों की हम पूजा करते हैं, वे ऊर्जा के महत्वपूर्ण केंद्र हैं, लेकिन हम उनसे आत्मिक रूप से जुड़ने का प्रयास नहीं करते।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि अपने घर का कचरा निकालकर दूसरे के घर में डालना सबसे बड़ा कषाय है। इसी तरह अपने गच्छ के मोह में दूसरे गच्छ के प्रति टीका-टिप्पणी करना भी मोह का बड़ा बंधन है। इससे साधना बाधित होती है। अपने गुरु भगवंतों के प्रति स्नेह और अहोभाव रखें, लेकिन दूसरों के प्रति टिप्पणी करने से बचें। उन्होंने कहा कि परमात्मा से किया प्रेम कभी निष्फल नहीं होता, जबकि व्यक्ति से किया प्रेम निष्फल हो सकता है।
धर्मसभा में मणिधारी जिनचंद्र सूरिश्वर महाराज और मणिधारी जिनदत्त सूरिश्वर महाराज के जीवन प्रसंगों का वर्णन करते हुए उनके धर्म, साधना और त्यागपूर्ण जीवन से प्रेरणा लेने का संदेश दिया गया। देवचंद्र सूरिश्वर महाराज के जीवन एवं स्नात्र पूजा की परंपरा का भी उल्लेख किया गया।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर धर्मसभा को भक्तिमय बना दिया।
पर्युषण में करें आत्ममंथन, पूछें स्वयं से-‘जीवन में आखिर क्या पायाःसाध्वी विद्युतप्रभा
