उदयपुर। मेवाड़ की समृद्ध आदिवासी लोक संस्कृति और परंपरा का प्रतीक गवरी लोकनाट्य का शुभारंभ हो गया है। रक्षाबंधन के बाद शुरू होने वाली गवरी करीब 40 दिनों तक ग्रामीण अंचलों में विभिन्न गांवों में खेली जाती है। गवरी को नृत्य, संगीत, अभिनय और धार्मिक आस्था का अनूठा संगम माना जाता है।
इसी परंपरा के तहत आज गोवर्धन विलास क्षेत्र के एक बटा कोलोनी में गवरी का आयोजन किया गया। आयोजन की व्यवस्था अशोक गोस्वामी के संयोजन में की गई है। आज भगवा धारण करने के साथ ही कलाकारों ने आगामी 40 दिनों तक चलने वाली इस लोक परंपरा की शुरुआत की।
आज देवाली गांव की गवरी टोली गोवर्धन विलास पहुंची, जहां कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में विभिन्न पात्रों का अभिनय करते हुए लोकनाट्य प्रस्तुत किया। ढोल-मांदल की थाप, घुंघरुओं की झंकार और पारंपरिक संवादों के साथ गवरी का मंचन देखने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण एवं क्षेत्रवासी जुटें।
गवरी के कलाकारों ने बताया कि गवरी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं बल्कि आस्था, तपस्या और सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा आयोजन है। गवरी के दौरान कलाकार निर्धारित नियमों और संयम का पालन करते हुए गांव-गांव जाकर प्रस्तुतियां देते हैं। इसमें भगवान शिव-पार्वती सहित पौराणिक एवं लोक कथाओं से जुड़े प्रसंगों को नृत्य और अभिनय के माध्यम से जीवंत किया जाता है।
मेवाड़ की पहचान है गवरी-गवरी के आगमन के साथ ही उदयपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में लोक संस्कृति की रौनक दिखाई देने लगती है। खुले मैदानों और चौपालों में होने वाला यह पारंपरिक लोकनाट्य आज भी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
भगवा धारण के साथ शुरू हुई गवरी, 40 दिनों तक गांव-गांव गूंजेगी मेवाड़ की लोकसंस्कृति
