उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक चातुर्मास के तहत शनिवार को आयोजित नियमित प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने आत्मचिंतन और आत्मकल्याण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि परमात्मा ने केवल्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए साढ़े बारह वर्ष तक कठोर साधना और तपश्चर्या की। उनकी साधना को श्रद्धापूर्वक सुनने और समझने का प्रयास किया जाए तो मन में सहज ही अहोभाव जागृत हो जाता है।
साध्वी श्री ने कहा कि आज मनुष्य संसार की गतिविधियों में घंटों लगा रहता है, लेकिन आत्मकल्याण के लिए आधा घंटा भी देना कठिन लगता है। हमारी रुचि संसार और दूसरों के दोषों को देखने में अधिक है। दूसरों की गलतियों पर लंबे समय तक चर्चा करते हुए हमारी स्मृति और तर्कशक्ति तेज हो जाती है, लेकिन जब अपने दोषों का विवेचन करने की बारी आती है तो सब कुछ भूल जाते हैं। व्यक्ति स्वयं को पूर्ण और निर्दाेष मानता है, जबकि अनादिकाल से आत्मा में संचित दोषों पर गंभीरता से चिंतन नहीं करता।
उन्होंने कहा कि स्वदोष दर्शन और परदोष दर्शन दो प्रकार के दर्शन हैं। मनुष्य में परदोष दर्शन की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति की पहचान यही है कि वह दूसरों के दोष खोजने के बजाय अपने दोषों को कम करने का प्रयास करे। जो व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति सजग और सक्रिय रहता है, वही मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ता है।
साध्वी विद्युतप्रभा ने कहा कि परमात्मा के शासन में जाति-पांति का भेद नहीं है। ये विभाजन मनुष्य ने बनाए हैं। तीर्थंकरों की दृष्टि में जीवों का विभाजन उनकी इंद्रियों के विकास के आधार पर है। पांचों इंद्रियों से मिलने वाले सुख को विषय लाभ कहा जाता है। किसी दृश्य को देखना आंख का कार्य है, लेकिन जब मन उसी में रम जाता है तो आसक्ति उत्पन्न होती है। भारतीय संस्कृति में त्याग को विशेष महत्व दिया गया है और आत्मकल्याण का मार्ग भी त्याग, संयम तथा आत्मचिंतन से होकर गुजरता है।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
परदोष नहीं, स्वदोष दर्शन से आत्मकल्याण की ओर बढ़ता है साधकःसाध्वी विद्युतप्रभा
