उदयपुर। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो, क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर में “भूमि संसाधन सूचीकरण के आधार पर जलग्रहण योजना के विकास हेतु मृदा सर्वेक्षण” विषय पर 3 से 12 अगस्त, 2026 तक आयोजित 10 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन राजस्थान सरकार के जलग्रहण विकास एवं मृदा संरक्षण विभाग के प्रायोजन में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भा.कृ.अ.प.-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो, नागपुर के निदेशक डॉ. एन. जी. पाटिल ने की। डॉ. प्रताप सिंह, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति ने मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डॉ. एच. बिस्वास, प्रमुख, भूमि उपयोग नियोजन प्रभाग, भा.कृ.अ.प.-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो, नागपुर थे।
कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. बी. एल. मीना, प्रशिक्षण निदेशक तथा क्षेत्रीय केंद्र प्रमुख, भा.कृ.अ.प.-राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो, उदयपुर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भूमि संसाधन सूचीकरण पर आधारित वैज्ञानिक मृदा सर्वेक्षण एवं जलग्रहण योजना का निर्माण प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, सतत कृषि विकास तथा जल संसाधनों के समुचित प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. एन. जी. पाटिल ने कहा कि आधुनिक तकनीकों एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से तैयार की गई जलग्रहण योजनाएं कृषि उत्पादकता बढ़ाने, मृदा एवं जल संरक्षण तथा ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त ज्ञान का प्रभावी उपयोग अपने कार्यक्षेत्र में करने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि भूमि संसाधनों का वैज्ञानिक आकलन एवं उनके आधार पर तैयार की गई योजनाएं प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन की आधारशिला हैं। उन्होंने इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। विशिष्ट अतिथि डॉ. एच. बिस्वास ने कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रशिक्षुओं के ज्ञान एवं कौशल को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि मृदा एवं भूमि संसाधन सूचीकरण आधारित वाटरशेड विकास के माध्यम से अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सतत कृषि विकास एवं बेहतर वाटरशेड प्रबंधन की दिशा में अत्यंत उपयोगी बताया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. आर. पी. शर्मा, प्रधान वैज्ञानिक ने प्रशिक्षण की रूपरेखा, विभिन्न तकनीकी सत्रों एवं फील्ड अभ्यास की जानकारी दी। दस दिवसीय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में राजस्थान के जलग्रहण विकास एवं मृदा संरक्षण विभाग के अधिकारी एवं तकनीकी कार्मिक ने भाग लिया। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षुओं को मृदा सर्वेक्षण, भूमि संसाधन सूचीकरण, जीआईएस, रिमोट सेंसिंग तथा डिजिटल मृदा मानचित्रण से संबंधित महत्वपूर्ण एवं उपयोगी जानकारी प्रदान की गई। व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के उद्देश्य से मृदा संग्रहालय एवं मृदा परीक्षण प्रयोगशाला का भ्रमण भी कराया गया। इसके साथ ही, सीटीएई परिसर, झाड़ोल वाटरशेड तथा कुंभलगढ़ वाटरशेड में मृदा प्रोफाइल अध्ययन हेतु भ्रमण कराए गए। प्रशिक्षुओं ने प्रशिक्षण की विषय-वस्तु, क्षेत्र भ्रमण के दौरान किए गए मृदा प्रोफाइल अध्ययन तथा राजस्थान में भविष्य के वाटरशेड विकास के संदर्भ में प्रशिक्षण की व्यावहारिक उपयोगिता की अत्यधिक सराहना की। डॉ. अजीत कुमार मीणा ने कार्यक्रम के सफल संचालन में सहयोग प्रदान किया और अंत में प्रशिक्षण समन्वयक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. महावीर नोगिया ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए सभी प्रतिभागियों, अधिकारियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. आर. एस. मीणा, डॉ. आर. एल. मीणा, डॉ. अभिषेक जांगीड, डॉ. लाल चन्द मालव, डॉ. बृजेश यादव, डॉ. अजिन एस अनिल एवं तकनीकी अधिकारी उपस्थित थे।
