गुरुकुल से कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक: भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता- प्रो सारंगदेवोत

उदयपुर 11 मई / भारतीय वैदिक शिक्षा पद्धति केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न होकर जीवन मूल्यों, व्यवहारिक ज्ञान और “लाइफ लॉन्ग लर्निंग” पर आधारित थी। गुरुकुलों में सामाजिक, नैतिक एवं व्यवहारिक शिक्षा के साथ अनुशासन, सादा जीवन और समान शिक्षा व्यवस्था को महत्व दिया जाता था। वेद, योग, भाषा, संस्कृति, गणित और भूगोल जैसे विषय अनुभव आधारित पद्धति से पढ़ाए जाते थे।
भारतीय ज्ञान परंपरा संवाद, संस्कृति और परंपराओं के माध्यम से आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। न्याय दर्शन, पाणिनि का व्याकरण और भारतीय तर्क पद्धति आधुनिक एल्गोरिदम व मशीन लर्निंग के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं।  शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो मानवीयता, वैज्ञानिकता, आधुनिकता और भारतीय आत्मा से जुड़ी हो, क्योंकि जड़ों से जुड़कर आगे बढ़ना ही वास्तविक विकास और राष्ट्र निर्माण का आधार है।

उक्त विचार सोमवार को राजस्थान विद्यापीठ के कुलपति प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने राजस्थान विद्यापीठ एवं निर्मला कॉलेज ऑफ एजुकेशन, उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान मे  आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन में कहे।

प्रो . सारंगदेवोत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने विश्व को विश्वविद्यालयों और समृद्ध ज्ञान धरोहर प्रदान की है। शंकराचार्य, रामायण और महाभारत जैसे भारतीय चिंतन ने जीवन, आध्यात्मिकता और मोक्ष का मार्ग दिखाया। उन्होंने कहा कि आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सूचना का दौर है, लेकिन “क्या केवल गति ही प्रगति है?” जैसे प्रश्नों के उत्तर भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित हैं।

उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में गुरु चरित्र निर्माण के शिल्पकार होते थे तथा शिक्षा के माध्यम से प्रकृति से जुड़ाव, नैतिकता, आत्मबोध और राष्ट्र चेतना विकसित की जाती थी। नई शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और मूल्य आधारित शिक्षा को वर्तमान पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।

शिक्षा वही सार्थक है, जो राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण और व्यवहारिक जीवन की कसौटी पर खरी उतरे – कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर

मुख्य अतिथि कुलप्रमुख एवं कुलाधिपति भँवर लाल गुर्जर ने कहा कि भारतीय शिक्षा गुरुकुल परंपरा से आगे बढ़ते हुए आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग तक पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि एआई ने कार्यप्रणाली को सरल और त्वरित बनाया है, किंतु नैतिक मूल्यों और संस्कारों का महत्व आज भी सर्वोपरि है। शिक्षा वही सार्थक है, जो राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण और व्यवहारिक जीवन की कसौटी पर खरी उतरे।

विशिष्ट अतिथि निर्मला कॉलेज तथा निर्मला कॉलेज ऑफ एजुकेशन इन्दौर के निदेशक एवं शिक्षाविद डॉ. फादर एंथनी जोसेफ ने कहा कि गुरुकुल परंपरा व्यक्तित्व निर्माण, अनुशासन और सर्वांगीण विकास पर आधारित थी, जबकि आधुनिक शिक्षा और एआई ने ज्ञान की पहुंच को आसान बनाया है। उन्होंने कहा कि तकनीक के साथ मानवीय मूल्यों और संस्कारों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही शिक्षकों की भूमिका भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वित दृष्टिकोण को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण है।

प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने  कहा कि ज्ञान मानव जीवन, विश्व कल्याण और समग्र विकास का आधार है। उन्होंने कहा कि जहां प्राचीन काल में ज्ञान अनुभव, चिंतन और व्यवहार से प्राप्त होता था, वहीं आज एआई ने ज्ञान और सूचना की प्रक्रिया को अत्यंत तीव्र बना दिया है। नई शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में उन्होंने आधुनिक तकनीक के साथ सांस्कृतिक जड़ों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े रहने पर बल दिया।

संगोष्ठी समन्वयक प्रो. अमित राठौड़ ने बताया कि संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर सार्थक विमर्श करना है। उन्होंने बताया कि विभिन्न तकनीकी सत्रों में  प्राचार्या डाॅ. पंकजा सोनवलकर उज्जैन,  डॉ. कुसुम यादव कड़ी गुजरात, प्रा.े जीवन सिंह खरकवाल, प्रो. मंजू मांडोत, डॉ. कुसुम यादव उज्जैन, डॉ. कीर्ति दीदी उज्जैन, डॉ. अल्पना भार्गव  की उपस्थिति में राजस्थान के साथ यूपी , एमपी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से करीब 150 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की।

पुस्तक का हुआ विमोचन – समारोह में  अतिथियों द्वारा प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. अमी राठौड,  डॉ. अमित दवे द्वारा संपादित पुस्तक “म्अवसअपदह त्वसम व िब्वउउनदपबंजपवद पद डवकमतद ैवबपमजल” का अतिथियों द्वारा विमोचन भी किया गया।

संगोष्ठी में प्रो. बलिदान जैन , प्रो. रचना राठौर , प्रो. भूरालाल श्रीमाली, प्रो. अमी राठौर, प्रो. सुनीता मोरिया, डॉ. कैलाश चंद्र चैधरी ,डॉ. सरिता मेनारिया ,डॉ. पुनीत पंड्या, डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. पल्लव पांडे ,डॉ. अमित दवे, डॉ. रेनू हिंगड, डॉ. हिम्मत सिंह  चुंडावत, डॉ. अमित बाहेती ,डॉ. महेंद्र वर्मा डॉ. तिलकेश आमेटा सहित  एकेडमिक एवं शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े विषय विशेषज्ञ एवं शोधार्थियों ने भाग लिया।
संचालन डॉ. हरीश चैबीसा डॉ. इंदु  आचार्य ने किया जबकि धन्यवाद प्रो. रचना राठौर ने ज्ञापित किया।

By Udaipurviews

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