विद्या भवन का 95 वाँ स्थापना दिवस 21 जुलाई मंगलवार को 

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें
विद्या भवन का विचार 1926 में जन्मा, स्थापना 1931 में हुई।
विचार के सौ वर्ष पूर्ण हुए, पांच वर्ष पश्चात स्थापना के सौ वर्ष पूर्ण होंगे।
समय बदला पर मूल विचार अभी भी कायम
-आलेख : डॉ अनिल मेहता 
विद्या भवन की यात्रा  किसी भवन से नहीं वरन  एक विचार से प्रारंभ  हुई ।वर्ष  1926 में यूरोप में  एक  रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे   डॉ. मोहन सिंह मेहता ‘भाईसाहब’ के मन में  ऐसे शिक्षण संस्थान का विचार आया, जो अपने समय से आगे हो। जहां  लड़के लड़कियों की सह शिक्षा हो।ऐसा संस्थान जो केवल शिक्षित व्यक्ति नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक तैयार करे।ऐसे नागरिक जो चरित्रवान और स्वावलंबी हों। शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से मजबूत हों।लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखते हों । समाज और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हों और स्वतंत्रता मिलने के बाद नए भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार हों। वर्ष 1926 में पनपे विद्या भवन के विचार को इस  वर्ष 2026 में सौ वर्ष पूर्ण हो गए है।
 डॉ. मोहन सिंह मेहता और उनके साथियों डॉ. के.एल. श्रीमाली, सादिक अली, फतेहलाल वर्डिया और केसरी लाल बोरदिया  ने वर्ष 1931 में  विद्या भवन   की नींव रखी। ये  सभी  महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर और स्काउट आंदोलन के विचारों से प्रभावित  थे।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू  से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह , प्रथम राष्ट्रपति  डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर पूर्व राष्ट्रपति एवं पूर्व राज्यपाल प्रतिभा पाटिल तक—देश की अनेक महान विभूतियों  ने विद्या भवन  को अपनी ऊर्जा, स्नेह और प्रेरणा प्रदान की है। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण  जैसे व्यक्तित्वों ने  यंहा आकर शिक्षकों और विद्यार्थियों से संवाद किया। जहां की शिक्षिका सरला बेन(मेरी कैथरीन हाइलमन) महात्मा गांधी की प्रमुख सहयोगी बनी।
यहां के हेडमास्टर और अध्यक्ष रहे  डॉ. कालू लाल श्रीमाली  भारत के शिक्षा मंत्री बने। विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य रहे वासुदेव देवनानी  राजस्थान के शिक्षा मंत्री बने और वर्तमान में  राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष हैं।
इसके पूर्व विद्यार्थियों में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, पूर्व मंत्री  बीना काक ,  पूर्व विदेश सचिव जगत मेहता और जे.एन. दीक्षित, महान वैज्ञानिक , अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक  डी.एस. कोठारी, गोवर्धन मेहता , प्रतिष्ठित  उद्योगपति  अरविंद सिंघल  तथा न्यायपालिका में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले न्यायमूर्ति गोविंद माथुर  जैसे अनेक उल्लेखनीय नाम शामिल हैं।
विद्या भवन की यात्रा एक विचार से शुरू हुई ।समय बदला, संस्थान बढ़े लेकिन विद्या भवन का  मूल विचार नहीं बदला ।  अपने  लक्ष्यों की पूर्ति के लिए विद्या भवन ने शिक्षक प्रशिक्षण,  उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, कृषि विज्ञान, शैक्षिक अनुसंधान, ग्रामीण विकास और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में संस्थानों और कार्यक्रमों की स्थापना की।
जहां कक्षा की चारदीवारी समाप्त होती है, वहीं से विद्या भवन की शिक्षा शुरू होती है। विद्या भवन ने सिद्ध किया है कि  शिक्षा केवल कक्षा में नहीं होती। खेल का मैदान, कार्यशाला, प्रयोगशाला, खेत, गांव, जंगल और समुदाय—सभी सीखने के स्थान हो सकते हैं। इसीलिए विद्या भवन ने अकादमिक शिक्षा के साथ खेल, कला, संस्कृति, श्रम, सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक उत्तरदायित्व को बराबर महत्व दिया। सह-शिक्षा, अनुभव आधारित शिक्षण और सकारात्मक अनुशासन जैसे प्रयोग उस दौर में यहां प्रारंभ हुए, जब भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इन अवधारणाओं की व्यापक चर्चा भी नहीं थी।
आज विद्या भवन की पहचान स्कूल और कॉलेजों के समूह मात्र की नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के एक समग्र  तंत्र के रूप में है। यहां स्कूली शिक्षा से उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास, शिक्षक प्रशिक्षण, शैक्षिक अनुसंधान, कृषि विज्ञान, कृषक सहयोग, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण तक विविध क्षेत्रों में कार्य हो रहा है।
विद्या भवन की प्रयोगशाला अब किसी भवन या परिसर की सीमाओं में बंधी नहीं है। भूजल पुनर्भरण और सामुदायिक जल प्रबंधन से जुड़ा मारवी  प्रोजेक्ट, आयड  बेसिन में समग्र जल संसाधन प्रबंधन और  सेनिटेशन, स्वच्छता के क्षेत्र में किए गए शोध बताते हैं कि संस्था ने शिक्षा और अनुसंधान को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ने का प्रयास किया है।
विद्या भवन  यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन, यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी और अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण शैक्षिक एवं शोध कार्य करता हैं। कई राज्यों ने अपनी पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यचर्या के निर्माण में विद्या भवन की विशेषज्ञता का सहयोग लिया है। शिक्षा संबल जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से राजस्थान के अनेक सरकारी विद्यालयों में विज्ञान और गणित में विद्यार्थियों की मूलभूत समझ मजबूत करने के प्रयास हो रहे हैं। अपना सपना’ और ऊंची उड़ान जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों को बड़े सपने देखने और उन्हें साकार करने का अवसर दे रहे हैं। विद्यार्थी आईआईटी सहित देश के प्रतिष्ठित तकनीकी और मेडिकल संस्थानों तक पहुंच रहे हैं। कृषि के क्षेत्र में वैज्ञानिक खेती से लेकर पशु बांझपन उपचार तक के प्रयासों ने भी विद्या भवन की पहचान को शिक्षा परिसर से निकालकर खेत और किसान तक पहुंचाया है
खेल के क्षेत्र में विद्या भवन तीरंदाजी और शतरंज  में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी तैयार कर रहा है प्रस्तावित नई स्पोर्ट्स अकादमी इस दिशा में एक  महत्वपूर्ण कदम है।
विद्या भवन का इतिहास उपलब्धियों से भरा है, वर्तमान नई उपलब्धियां गढ़ रहा है और उसका शिक्षा-दर्शन भविष्य के भारत का संकेत देता रहा है। विद्या भवन में वर्ष 1970 में दीवार पर उकेरी गई पंक्तियां—“चंद्र विजेता भारत, सूर्य विजेता कब बनेगा”—आज भारत के आदित्य मिशन के रूप में साकार हो गया  हैं। यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि उस शिक्षा की अभिव्यक्ति है जो किशोरों , युवाओं को वर्तमान से आगे देखने, प्रश्न करने और भविष्य के सपने देखने की प्रेरणा देती है।
विद्या भवन के शिक्षा-दर्शन और अनुभूत प्रयोगों की प्रासंगिकता समय के साथ और बढ़ी है। अनुभव आधारित शिक्षा, बहुविषयी दृष्टिकोण, विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षण, कौशल, सामाजिक सरोकार और समग्र विकास जैसे जिन विचारों पर विद्या भवन दशकों से काम करता आया है, उनकी प्रतिध्वनि आज देश की नई शिक्षा नीति में भी दिखाई देती है।
पांच वर्ष पश्चात विद्या भवन  सौ वर्ष पूर्ण कर लेगा। विद्या भवन की  यात्रा केवल संस्थानों, इमारतों और उपलब्धियों की यात्रा नहीं है। यह एक विचार की यात्रा हैं।वह विचार  है कि अच्छी शिक्षा मनुष्य को केवल सफल नहीं, संवेदनशील भी बनाती है।केवल ज्ञान नहीं देती, विवेक भी देती है।केवल आजीविका का साधन नहीं देती, जीवन-दृष्टि भी  देती है। और केवल एक व्यक्ति का भविष्य नहीं बनाती—समाज और राष्ट्र के भविष्य को आकार देती है।
विश्व  जलवायु परिवर्तन, जल संकट, सामाजिक असमानता, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, ऑटोमेशन और तेजी से बदलते रोजगार की चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे समय में   विद्या भवन अपने गौरवशाली अतीत को सहेजते हुए, मूल विचार से विचलित नहीं होते हुए,  भविष्य की शिक्षा का नया मॉडल प्रस्तुत कर रहा है। ऐसा मॉडल जहां  ए आई   के साथ मानवीय संवेदना हो, तकनीक के साथ नैतिकता हो, वैश्विक दृष्टि के साथ स्थानीय समाज की समझ हो और आर्थिक विकास के साथ प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति उत्तरदायित्व हो।   95 वा  स्थापना दिवस  शिक्षा, संस्कृति, नागरिक चेतना और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व की इसी  विरासत को अक्षुण्ण  रखने की प्रतिबद्धता के साथ मना  रहा है।
स्थापना दिवस कार्यक्रम :
21 जुलाई , मंगलवार को  95 वे स्थापना दिवस  पर  जन जागरूकता रैली,    पौध नर्सरी  उद्घाटन  सहित विविध समारोह होंगे।  मुख्य समारोह विद्या भवन पब्लिक स्कूल, फतेहपुरा स्थित ओपन एयर थिएटर में आयोजित होगा।
 प्रात:  सात बजे जन-जागरूकता  रैली को उदयपुर के जिला कलक्टर गौरव अग्रवाल,  हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। रैली विद्या भवन स्कूल के नर्सरी गेट से प्रारंभ होकर फतेहसागर झील तक जाएगी और पुनः विद्या भवन परिसर लौटेगी।
 प्रात : सवा नौ बजे से  विद्या भवन ओपन एयर थिएटर में स्थापना दिवस का मुख्य समारोह  आयोजित होगा। समारोह के मुख्य अतिथि राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स लिमिटेड , उदयपुर के प्रबंध निदेशक पी. रमेश  होंगे। समारोह की अध्यक्षता  विद्या बंधु चंद्र सिंह के. मेहता करेंगे।   विद्या भवन सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. जितेंद्र कुमार तायलिया तथा भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की कोयला एवं ताप विद्युत संबंधी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष इंदर पाल सिंह मथारू, आईएफएस (सेवानिवृत्त) तथा विद्या भवन  मुख्य संचालक, पूर्व संभागीय आयुक्त राजेंद्र भट्ट  विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे।
सवा ग्यारह बजे  नवस्थापित पौध नर्सरी का उद्घाटन  सेवानिवृत्त आई एफ एस   इंदर पाल सिंह मथारू , विद्या भवन अध्यक्ष  डॉ. जितेंद्र कुमार तायलिया ,  उपाध्यक्ष   भगवत   बाबेल तथा मुख्य संचालक राजेंद्र भट्ट   करेंगे।
By Udaipurviews

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