उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में बुधवार को साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने भगवान महावीर के जीवन, साधना और पुरुषार्थ का प्रेरणादायी विवेचन किया। उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने समस्त कर्मों का क्षय कर केवल्य ज्ञान प्राप्त किया। इस उपलब्धि के पीछे उनका असाधारण पुरुषार्थ, तप और आत्मसाधना थी। हमें भी जीवन का लक्ष्य केवल सांसारिक सुख नहीं, बल्कि कर्मों के क्षय और मोक्ष प्राप्ति को बनाना चाहिए।
साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य जन्म-जन्मांतर से संसार के चक्र में घूम रहा है। जन्म लेना, जीवन जीना और फिर मृत्यु को प्राप्त होना,यह क्रम निरंतर चलता रहता है। यदि जीवन को सार्थक बनाना है तो इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना होगा। उन्होंने कहा कि आज मनुष्य स्वतंत्र जीवन चाहता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ शरीर धीरे-धीरे पराधीन होता चला जाता है। जो व्यक्ति कभी सहज रूप से कई किलोमीटर चल लेता था, वही बुढ़ापे में एक कदम चलने के लिए भी सहारे की आवश्यकता महसूस करता है।
उन्होंने कहा कि हमें ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए जिससे जन्म और मरण दोनों से मुक्ति मिल सके। जिस अवस्था में शरीर ही नहीं रहेगा, वहां इच्छाएं भी नहीं रहेंगी और इच्छाओं के अभाव में कर्मों का बंधन भी समाप्त हो जाएगा। जैन दर्शन में सिद्धशिला पर स्थित सिद्धात्माओं की अवस्था इसी पूर्ण मुक्ति का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर ‘रिएक्शन’ और ‘रेस्पॉन्स’ को एक ही समझने की भूल करता है। रिएक्शन जड़ता से उत्पन्न तत्काल प्रतिक्रिया है, जबकि रेस्पॉन्स चेतन, विवेकपूर्ण और सोच-समझकर किया गया कार्य है। परिस्थितियां जैसी भी हों, साधु और श्रावक तत्काल प्रतिक्रिया देने के बजाय विवेकपूर्वक रेस्पॉन्स करते हैं।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
रिएक्शन नहीं, विवेकपूर्ण रेस्पॉन्स ही चेतन जीवन की पहचानःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
