उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि मनुष्य अनादिकाल से आसक्ति और कर्मों के बंधन में उलझा हुआ है। तपस्या के माध्यम से कर्मों का क्षय कर आत्मा को निर्मल बनाया जा सकता है। जब कर्मों का आवरण हटता है, तभी आत्मा को उस आनंद की अनुभूति होती है, जो संसार की किसी भी वस्तु से प्राप्त नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की इच्छाओं और संग्रह की कोई सीमा नहीं है। अधिक से अधिक पाने की चाह में व्यक्ति कितना ही धन और साम्राज्य क्यों न जुटा ले, मन में ‘और चाहिए’ की भावना बनी रहती है। पदार्थों और परिग्रह का बोझ बढ़ाने से जीवन सुखी नहीं होता। व्यक्ति त्याग के लिए उचित समय का इंतजार करता रहता है, लेकिन वह समय कभी नहीं आता।
साध्वीश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं तय करना होगा कि वह जीवन में संग्रह करने वाला बनना चाहता है या त्याग करने वाला। लोभ की स्थिति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि व्यक्ति स्वयं भी संसाधनों का उपयोग न कर सके और जरूरतमंदों के साथ बांटने में भी कमी पड़ने का भय महसूस करे। उन्होंने श्रेणिक राजा के प्रसंग के माध्यम से परोपकार और सेवा भावना का महत्व समझाया।
उन्होंने कहा कि संतों की वाणी सुनानंे का उद्देश्य यही है कि यदि एक व्यक्ति भी सम्यक ज्ञान प्राप्त कर अपने जीवन की दिशा बदल ले तो संतों का आगमन सार्थक हो जाता है। संयम का वास्तविक आनंद केवल सुनने या जानने से नहीं, बल्कि उसे जीवन में अपनाने से अनुभव किया जा सकता है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्तिमय गीत प्रस्तुत किया।
संग्रह की सीमा नहीं, त्याग में ही आत्मा का सच्चा आनंदःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
