हत्या, विश्वासघात, दरिंदगी और स्वार्थ की बढ़ती घटनाएँ केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं हैं। ये उस समाज का आईना हैं, जहाँ मनुष्य तो बचा है, लेकिन मनुष्यता कहीं खो गई है।
सुबह अख़बार खोलिए। मोबाइल पर न्यूज़ देखिए। शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता हो, जब कोई खबर आत्मा को झकझोर न दे। कहीं पत्नी अपने पति की हत्या कर देती है। कहीं मंगेतर अपने प्रेमी के साथ मिलकर उस युवक की जान ले लेता है, जिसके साथ जीवन बिताने की कसमें खाई थीं। कहीं दूधमुंही बच्ची दरिंदगी का शिकार बनती है। कहीं बेटा पिता का हत्यारा बन जाता है। कहीं बेटी अपने जन्मदाता की हत्या की साजिश में शामिल पाई जाती है। कहीं रिश्तों की मर्यादा तार-तार होती है। हर दिन कोई न कोई खबर यह कहती है कि अपराध बढ़े नहीं हैं बल्कि इंसान के भीतर बैठा इंसान छोटा होता जा रहा है।
प्रश्न केवल अपराधियों का नहीं है। प्रश्न पूरे समाज का है। आखिर वह संवेदना कहाँ चली गई, जो किसी अनजान की पीड़ा देखकर भी आँखें नम कर देती थी? वह करुणा कहाँ खो गई, जिसने भारत को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देने वाला देश बनाया? क्या आधुनिकता की दौड़ में हमने अपनी आत्मा ही गिरवी रख दी?
आज रिश्ते भी सुविधा के अनुबंध बनते जा रहे हैं। जब तक लाभ है, तब तक अपनापन है। स्वार्थ समाप्त होते ही संबंधों की उम्र भी समाप्त हो जाती है। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास पर नहीं, शक पर खड़ा दिखाई देता है। माता-पिता बोझ लगने लगे हैं। बच्चे संस्कारों से नहीं, स्क्रीन से बड़े हो रहे हैं। परिवार साथ रहते हुए भी भीतर से बिखर रहे हैं।
कुछ दिन पहले एक घटना सुनने को मिली। एक सेवक वर्षों तक अपने मालिक के घर में रहा। उसने परिवार के हर सुख-दुःख में साथ दिया। रात-दिन सेवा की। लेकिन जब उसके माता-पिता का निधन हुआ, तब मालिक के पास दो मिनट की संवेदना भी नहीं थी। वह शोक व्यक्त करने तक नहीं पहुँचा। उस दिन लगा कि गरीबी पैसों की नहीं, संवेदनाओं की होती है।
आज श्मशान भी मनुष्य को नहीं बदल पा रहा। जहाँ हर चिता जीवन का अंतिम सत्य सुनाती है, वहीं लोग मोबाइल पर सौदे तय कर रहे होते हैं। कोई अगले व्यापार की योजना बना रहा होता है, कोई संपत्ति का हिसाब लगा रहा होता है, कोई किसी को मात देने की रणनीति बना रहा होता है। जिस स्थान पर वैराग्य जन्म लेना चाहिए, वहाँ भी स्वार्थ का बाजार सज गया है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा था-
“क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो।”
दिनकर का संदेश केवल शक्ति का नहीं, चरित्र का भी है। शक्ति तब तक पूजनीय है, जब तक उसके साथ मर्यादा और मानवता जुड़ी हो। अन्यथा वही शक्ति अत्याचार बन जाती है।
उन्होंने यह भी लिखा-
“मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।”
यदि मनुष्य ठान ले, तो समाज बदल सकता है। लेकिन परिवर्तन कानून से पहले चरित्र में आना होगा। संविधान हमें अधिकार देता है, संस्कार हमें इंसान बनाते हैं। कानून अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण केवल परिवार, शिक्षा और समाज ही कर सकते हैं।
आज बच्चों को करियर सिखाया जा रहा है, लेकिन करुणा नहीं। प्रतियोगिता सिखाई जा रही है, पर सह-अस्तित्व नहीं। सफलता का अर्थ धन, पद और प्रसिद्धि तक सीमित हो गया है। किसी ने यह नहीं सिखाया कि यदि आपकी सफलता किसी की पीड़ा पर खड़ी है, तो वह सफलता नहीं, पराजय है।
हम मंदिरों में करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते हैं, लेकिन घर के वृद्ध माता-पिता के पास बैठने का समय नहीं है। हम धार्मिक यात्राएँ करते हैं, लेकिन पड़ोस के दुखी परिवार का हाल पूछने नहीं जाते। हम समाज में सम्मान चाहते हैं, लेकिन अपने कर्मचारियों और सहयोगियों को सम्मान देना भूल जाते हैं। यह धर्म नहीं, केवल उसका प्रदर्शन है।
भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता से नहीं बनी। उसकी पहचान सेवा, त्याग, करुणा और सहिष्णुता से बनी। यही वह भूमि है जहाँ श्रवण कुमार हुए, पन्ना धाय हुईं, महात्मा गांधी हुए, और अनगिनत ऐसे लोग हुए जिन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीवन जिया। यदि हम इस विरासत को खो देंगे, तो हमारे पास ऊँची इमारतें तो होंगी, लेकिन ऊँचे आदर्श नहीं।
समाज को आज नए हथियारों की नहीं, नए विचारों की आवश्यकता है। नए कानूनों की नहीं, नए संस्कारों की आवश्यकता है। बड़े घरों की नहीं, बड़े हृदयों की आवश्यकता है। क्योंकि सभ्यता मशीनों से नहीं, मनुष्यता से जीवित रहती है।
आज रात सोने से पहले केवल एक प्रश्न स्वयं से पूछिए-क्या मेरे कारण किसी की आँख में मुस्कान आई? क्या मैंने किसी पीड़ित का हाथ थामा? क्या मैंने किसी कर्मचारी, किसी गरीब, किसी वृद्ध, किसी असहाय के साथ मनुष्य जैसा व्यवहार किया?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो मानवता अभी जीवित है।
यदि उत्तर “नहीं” है, तो हमें दूसरों को नहीं, पहले स्वयं को बदलने की आवश्यकता है।
क्योंकि इतिहास यह याद नहीं रखता कि किसी व्यक्ति के पास कितना धन था। इतिहास केवल इतना याद रखता है कि उसके भीतर कितनी मानवता थी।
आज सबसे बड़ा संकट आर्थिक नहीं, राजनीतिक नहीं, तकनीकी भी नहीं। सबसे बड़ा संकट है-मनुष्य के भीतर से मानवता का लुप्त हो जाना।
✍️ लेखक:भगवान प्रसाद गौड़, उदयपुर
