उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि जीवन घटनाओं से रहित नहीं हो सकता, लेकिन उन घटनाओं को देखने और समझने की हमारी दृष्टि ही सुख-दुख का निर्धारण करती है। घटना से अधिक महत्वपूर्ण उसके प्रति हमारे भाव और विचार होते हैं।
साध्वी श्रीजी ने कहा कि अपने दोषों के प्रति वेदना और दूसरों के दुख के प्रति संवेदना का भाव होना चाहिए। जिस व्यक्ति के भीतर वेदना और संवेदना दोनों जागृत हो जाएं, उसका अध्यात्म के क्षेत्र में प्रवेश माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि जीवन में हम अक्सर दूसरों के दोष और गलतियां खोजकर अपने मन में नकारात्मकता का कचरा भरते रहते हैं। यही मानसिक कचरा हमारे सुख और शांति में बाधक बनता है।
उन्होंने कहा कि जहां केवल आदेश के आधार पर काम होता है, वहां व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती। नेतृत्व में सभी की बात सुनना, विचार-विमर्श के बाद निर्णय लेना और फिर उस निर्णय को स्वीकार करने की मानसिकता रखना आवश्यक है। इससे परिवार और संस्था दोनों में बेहतर समन्वय बना रहता है।
साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि दृष्टि बदलते ही व्यक्ति और परिस्थितियों का अर्थ बदल जाता है। जहां गुण दिखाई देने लगते हैं, वहां अवगुण नजर नहीं आते और जहां अवगुण पर ध्यान केंद्रित होता है, वहां गुण भी दिखाई नहीं देते। एक व्यक्ति किसी के लिए सज्जन हो सकता है तो दूसरे के लिए वही व्यक्ति दुर्जन नजर आ सकता है। इसलिए देखने वाले की मानसिकता और दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि संसार नहीं होता तो तीर्थंकरों का प्राकट्य भी नहीं होता और साधु, श्रावक-श्राविकाओं की परंपरा भी नहीं बनती। संसार में रहते हुए भी यह समझना आवश्यक है कि यहां कुछ भी शाश्वत नहीं है। इसी बोध से मनुष्य असार संसार के बीच सार की खोज कर सकता है।
प्रवचन के दौरान साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।
वेदना और संवेदना से जागता है अध्यात्म का द्वारःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
