सम्पूर्ण जगत में प्राचीन भारतीय ज्ञान पर शोध व अध्ययन आवश्यक – राज्यपाल श्री हरिभाऊ बागड़े

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

राज्यपाल ने कहा, विश्व में अक्षुण्ण रही है भारत की ज्ञान परम्परा
उदयपुर, 23 अगस्त। पेसिफिक अकादमी ऑफ़ हायर एजुकेशन एन्ड रिसर्च विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग, वेश्विक संस्कृत मंच एवं वैश्विक इतिहास मंच के तत्वावधान में आयोजित प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्पराः ज्ञान एवं विज्ञानं के आधुनिक आयाम विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी रविवार कोसंपन्न हुई।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि राज्यपाल श्री हरिभाऊ किशनराव बागड़े ने कहा कि विदेशी दार्शनिकों भाषाविदांे, लेखकों ने भी भारतीय ज्ञान परम्परा भौतिक क्षमता, समृद्ध भाषा, वेश्विक दर्शन, परमाणुवाद के लोहे को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन और विकास के लिए भारत में आठ लाख गुरुकुल, विद्यालय और आश्रम संचालित थे, जिनको पतन के कगार पर पंहुचाकर लार्ड मैकाले ने भारतीय संस्कृति, ज्ञान, विज्ञानं पर आघात किया, जो भारत में अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के रूप में दृष्टाव्य है। इससे यहां के लघु कुटीर उद्योगों का पतन हुआ। उन्होंने अपने उद्बोधन में बप्पा रावल द्वारा विदेशी आक्रमणकरियों को भारत भूमि से बाहर निकालने से सम्बंधित विविध उद्धरण प्रस्तुत किए।

स्वागत उद्बोधन में कुलगुरु प्रो. हेमंत कोठारी ने भारतीय ज्ञान परम्परा और शोध की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए विश्वविद्यालय की विभिन्न इकाईयों एवं संचालित सभी गतिविधियों का विस्तृत विवरण दिया। प्रो. कोठारी ने बताया कि कैसे स्थानीय ज्ञान और पवित्र ज्यामिति आज के इनोवेशन के लिए ज़रूरी आधार प्रदान करते हैं। उन्होंने एकेडमिक और वैज्ञानिक समुदायों से हमारी साझा विरासत को सिर्फ़ एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड के तौर पर नहीं, बल्कि हमारे जारी वैज्ञानिक पुनर्जागरण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उदय के लिए एक सक्रिय और मानवीय बनाने वाले उत्प्रेरक के रूप में अपनाने का आग्रह किया।

पेसिफिक विश्वविद्यालय के समूह अध्यक्ष प्रो बीपी शर्मा ने बताया कि प्राचीन भारतीय ज्ञान आज विभिन्न आधुनिक ज्ञान के विविध विषयों के लिए उन्नत संदर्भ योग्य है। प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के प्रत्येक शब्द में अत्यंत ज्ञान निहित है। आप इन विभिन्न प्रसंगों-सन्दर्भों पर देश-विदेश में अत्यंत महत्वपूर्ण अनुसंधान किए जा रहे हैं। उदाहरणतः नोबेल पुरस्कार विजेता एलिजाबेथ ब्लैकबर्न ने योग में दीर्घश्वसन पर अनेक प्रयोग किए हैं। उन्होंने पाया कि योग में लिखे अनुसार दीर्घश्वसन करने पर व्यक्ति के क्रोमोसोम के टेलोमर्स की लंबाई बढ़ जाती है। पूर्णविराम इससे तनाव, नीरोग, वृद्धावस्था से बचाव होता है।

अल्बर्टा यूनिवर्सिटी और पुर्तगाल का प्रतिनिधित्व करने वाली रेबेका टेलर (ऑस्ट्रेलिया) ने प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों के अत्यधिक महत्व को बताते हुए कहा कि आज के दौर में प्राचीन मूर्तिकला की परंपराओं की स्थायी प्रासंगिकता पर बेहतरीन ढंग से चर्चा करते हुए कहा कि कैसे आधुनिक कलात्मक अभिव्यक्ति में भी प्राचीन काल के विशाल मंदिरों जैसी ही ज्यामितीय लय और आध्यात्मिक गूंज मिलती है।
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो कैलाश डागा भी मौजूद रहे। आयोजन सचिव प्रो. अजातशत्रु सिंह शिवरती ने बताया कि इस संगोष्ठी मे कुल 222 शोध पत्र वाचन किये गए। धन्यवाद संगोष्ठी निदेशक प्रो टी. पी. आमेटा ने ज्ञापित किया। संगोष्ठी आयोजन की सफलता में प्रो. दिलेन्द्र हिरन और प्रो. हेमंत पंड्या का सराहनीय सहयोग रहा। संचालन प्रो मेहंदी ने किया।

By Udaipurviews

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