महर्षि दयानन्द सरस्वती ने बनाया वेदों में प्रवेश का मार्ग
उदयपुर। सुविवि संस्कृत विभाग में महर्षि दयानन्द सरस्वती की 200वीं जन्म जयन्ती और आने वाली श्रावणी पूर्णिमा – संस्कृत दिवस के उपलक्ष्य में विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया । मुख्यवक्ता गुरुकुल प्रभात आश्रम के स्नातक और एम एस जे कॉलेज भरतपुर के प्रोफेसर योगेंद्र कुमार भानु ने वैदिक और संस्कृत परम्परा को महर्षि दयानन्द के योगदान पर व्याख्यान दिया । महर्षि दयानन्द ने वैदिक और संस्कृत साहित्य के वास्तविक अभिप्राय को जानने-समझने के लिए वेदांग प्रकाश जैसे 32 ग्रन्थों की रचना की । वेदों में प्रवेश करने के लिए उन्होंने ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका नामक ग्रन्थ लिखा । उन्होंने वेद को जानने के लिए निरुक्त का वैदिकमार्ग और संस्कृत को जानने के लिए पाणिनीय मार्ग को प्रतिष्ठित किया । दयानन्द ने ब्रह्मा से लेकर महर्षि जैमिनी तक ऋषियों के वचनों को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया । आयोजन की अध्यक्षता करते हुए सुविवि संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. नीरज शर्मा ने महर्षि दयानन्द सरस्वती और उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह के संबंध एवं स्वाधीनता और स्वदेशी आन्दोलन में महर्षि दयानन्द के योगदान को रेखांकित किया । प्रो. शर्मा ने सत्यार्थप्रकाश की रचना-भूमि गुलाबबाग- नवलखा महल और सत्यार्थप्रकाश न्यास के योगदान की भी चर्चा की । कार्यक्रम में शोधार्थियों, छात्रों के साथ ही विवि के शिक्षक डॉ. जी.एल. पाटीदार, डॉ. सतीश चन्द अग्रवाल, डॉ. बालूदान बारहठ और मीरा कॉलेज की प्रोफेसर अंजना मौजूद रही । कार्यक्रम का संयोजन डॉ. मुरलीधर पालीवाल ने किया ।
