चातुर्मासिक प्रवचन में डॉ. राजेंद्र मुनि ने कर्म और आत्मिक आनंद का बताया महत्व
उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, उदयपुर के तत्वावधान में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कर्म सिद्धांत और आत्मिक आनंद पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इंसान जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है। कर्म ही मनुष्य के जीवन की दिशा और दशा निर्धारित करते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर अपने दुखों के लिए दूसरों को दोषी मानता है, जबकि वास्तव में उसके सुख-दुख के पीछे उसके स्वयं के कर्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरों के प्रति दोषारोपण करने से संसार में आसक्ति और द्वेष बढ़ता है। इसके विपरीत अच्छे विचार, सदाचार और सकारात्मक भावनाएं जीवन को आंतरिक रूप से समृद्ध बनाती हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार विद्यार्थी सही ढंग से अभ्यास और पढ़ाई करता है तो परीक्षा में सफलता प्राप्त करता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी निरंतर साधना, आत्मचिंतन और संयम आवश्यक है। बिना अभ्यास के सफलता संभव नहीं होती। इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों और भावों पर निरंतर ध्यान देना चाहिए।
प्रवचन में डॉ सुरेंद्र मुनि ने चाणक्य सिद्धमुनि और एण्टी-कुमारों की कथा के माध्यम से तप-त्याग की महिमा को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि भौतिक वैभव उपलब्ध होने के बावजूद आत्मिक आनंद की प्राप्ति के लिए साधना, त्याग और संयम का मार्ग अपनाना आवश्यक है। मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ने के लिए सांसारिक आसक्तियों का त्याग तथा आत्मकल्याण के प्रति समर्पण जरूरी है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में अच्छे कर्म, संयम, सेवा, सद्भाव और आत्मचिंतन को स्थान दें। मनुष्य के विचार और कर्म ही उसके भविष्य का निर्माण करते हैं।
सभा में उपाध्याय राकेश मुनि श्री ने मंगल भावना एवं दीपक के संबंध में प्रेरणादायी संदेश दिया। धर्म आराधना करने वाले श्रद्धालुओं को लकी ड्रॉ के माध्यम से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर संघ के अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन, महामंत्री हिम्मतलाल बडाला ,पूर्व महापौर रजनी डांगी,बसंतिलाल बडाला, निर्मल गोखरु द्वारा आभार व्यक्त कर 14 को सामूहिक एकसाना करने की सुचना दी गयी.
