संस्कार, संस्कृति, नैतिकता और संतोष को स्वयं में धारण करें

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

उदयपुर। आज की पीढ़ी के लिए यह आवश्यक दिखाई दे रहा है कि वह संस्कार, संस्कृति, नैतिकता और संतोष को स्वयं में धारण करे। यदि इन चारों को संभाल लिया गया तो हमारे टूटते परिवार संभल जाएंगे, समाजों की परस्पर प्रगाढ़ता संभल जाएगी, सनातन संस्कृति का भविष्य सशक्त हो जाएगा।
यह कहना है प्रख्यात कथावाचक पं. गौरव व्यास का। मूलतः अजमेर के रहने वाले और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में बीटेक कर वर्ष 2004 में सत्यम कम्पनी की 4.60 लाख सालाना पैकेज की नौकरी को मात्र 15 दिन में छोड़कर भगवद भक्ति के प्रचार में स्वयं को समर्पित कर देने वाले पं. व्यास इन दिनों उदयपुर में हैं। यहां माहेश्वरी समाज की ओर से चल रही कथा के दौरान विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि व्यक्ति में संतोष गुण लुप्त प्राय सा हो गया है। यदि इस गुण को ही हम धारण कर लें तो देश की सबसे बड़ी भ्रष्टाचार की समस्या लुप्त प्राय हो जाएगी।
उन्होंने कोरोनाकाल की घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके महाराष्ट्र के एक चिकित्सक मित्र ने नौकरी छोड़ दी, कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि वे कोरोना के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार की अति को नहीं देख सकते थे, न ही उसका हिस्सा बन सकते थे। उन्होंने खुद को इससे अलग कर लेना ही उचित समझा।
‘बिनु सत्संग विवेक न होई’ उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि हम सत्संग से दूर होते जा रहे हैं इसलिए सही और सकारात्मक निर्णय करने की क्षमता भी प्रभावित हो रही है। कुछ तो भागदौड़ की जिन्दगी और बची-खुची मोबाइल में बिना बात व्यस्त हो गई है। मोबाइल को ‘कर्णपिशाचिनी’ की संज्ञा देते हुए पं. गौरव व्यास कहते हैं कि तकनीक मानव समाज के लाभ के लिए बनी, भलाई के लिए बनी, किन्तु यह उतनी ही नकारात्मकता और अनैतिकता की ओर भी बढ़ चली है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी की समस्या यह भी है कि वह माता-पिता की कम सुनने लगी है। हर चीज ‘गूगल’ करने लगी है। ‘मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।।’ चौपाई को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि इस चौपाई के मर्म को समझकर आज की पीढ़ी अपने माता-पिता-गुरुजनों से सद्संस्कारों का अनुसरण सीखेगी तब स्वयं माता-पिता बनने के बाद अपनी संतानों को भी सद्संस्कार प्रदान कर पाएगी। प्रेम प्रसंगों के रिश्तों के जल्द टूटने के परिणामों की बढ़ती संख्या पर उन्होंने कहा कि प्रेम करना चाहिए, लेकिन प्रेम के साथ विवेकपूर्ण निर्णय की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
अब तक 18 हजार से अधिक नेत्रदान संकल्प करवा चुके पं. गौरव व्यास अपनी हर कथा में सभी से एक ही संकल्प दक्षिणा में मांगते हैं कि थाली में अन्न झूठा न छोड़ें। भ्रूण हत्या को लेकर भी संकल्प कराते हैं और बेटी का महत्व समझाते हैं। वे कहते हैं कि माता-पिता को भी एक बात समझनी होगी कि जैसा वे अपनी बेटी को देखना चाहते हैं वैसा ही बहू को भी देखें।

By Udaipurviews

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