कलश यात्रा के साथ गोकुल विलेज में संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का भव्य शुभारंभ

– व्यासपीठ पूजन एवं भक्ति भाव के साथ प्रारंभ हुई सात दिवसीय कथा
उदयपुर, 15 मई। शहर के सेक्टर 9 स्थित गोकुल विलेज कॉलोनी के श्री भोलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर पुष्कर दास महाराज के सानिध्य में आयोजित संगीतमय सात दिवसीय “श्रीमद् भागवत कथा” का शुभारंभ गुरुवार को भव्य कलश यात्रा के साथ हुआ। कथा प्रारंभ होने से पूर्व पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण छा गया तथा श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। कथा के प्रथम दिन उज्जैन से पधारे आचार्य संदीप शर्मा द्वारा विधि-विधान एवं वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भागवत पोथी एवं कलश पूजन सम्पन्न करवाया गया। इसके पश्चात भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं ने लाल एवं पारंपरिक वेशभूषा धारण कर सिर पर कलश रखकर सहभागिता निभाई। यात्रा मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं द्वारा पुष्पवर्षा कर कलश यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। मुख्य यजमान सूर्यप्रकाश व्यास एवं ओमलता व्यास ने परिवार सहित श्रद्धा भाव से भागवत पोथी को सिर पर धारण कर यात्रा में भाग लिया। महिलाएं भजनों पर झूमते हुए नृत्य करती नजर आईं, वहीं पुरुष श्रद्धालु भी भक्ति रस में डूबे हुए भजनों का आनंद लेते दिखाई दिए। पूरे मार्ग में “राधे-राधे” एवं “जय श्रीकृष्ण” के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। कथा प्रारंभ से पूर्व मुख्य यजमान परिवार द्वारा व्यासपीठ पूजन किया गया तथा पूज्य श्री पुष्कर दास महाराज का पगड़ी एवं उपरना ओढ़ाकर सम्मान किया गया। कथा के प्रथम दिवस महाराजश्री ने भागवत महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भागवत केवल कथा नहीं, बल्कि जीवन परिवर्तन का माध्यम है। उन्होंने कहा कि शौनक जी ने सूत जी महाराज से ऐसी कथा सुनाने का आग्रह किया था जो कानों को प्रिय लगे और मन में सकारात्मक परिवर्तन लाए। महाराज श्री ने कहा कि जिसने भगवान को अपना मान लिया, उसने भागवत के वास्तविक सार को समझ लिया। कथा और सत्संग का आयोजन करवाना सबसे बड़ा पुण्य कार्य है तथा करोड़ों जन्मों के पुण्य उदय होने पर ही किसी को भागवत कथा का आयोजन एवं श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। बिना कथा श्रवण के मनुष्य का मोह समाप्त नहीं हो सकता। उन्होंने भागवत शब्द की व्याख्या करते हुए बताया कि “भ” का अर्थ भक्ति, “ग” का अर्थ ज्ञान, “व” का अर्थ वैराग्य तथा “त” का अर्थ त्याग है। महाराजश्री ने कहा कि नरसी मेहता, सूरदास, कबीर, मीरा, नामदेव एवं तुकाराम जैसे संतों ने भगवान को अपना बनाकर भागवत के स्वरूप को जीवन में उतारा। आगे प्रथम अध्याय की कथा में आत्मदेव की कथा आती है द्य आत्मदेव के बालक नहीं होने के कारण वह परेशान होते हैं और संत उनके घर आते हैं द्य और प्रसाद देते हैं द्य पत्नी धुंधुली गर्भ का दुख नहीं भोगना चाहती ओर प्रसाद का सेवन नहीं करती है  प्रसाद गाय को खिला देती है द्य इधर उसकी बहन गरीब होती है और धुंधुली बहन को धन देती ओर अपनी बहन का बेटा अपने घर ले आती है द्य इधर गाय के बच्चा होता है शरीर इंसान के जैसा और कान गाय की तरह जिसका नाम गोकर्ण रखा द्य गोकर्ण संत की प्रसादी था वह तो पूजा,संध्या आदि करता बहन का बेटा धुंधूकारी बड़ा उद्यमी स्वभाव का होता है द्य बड़ों की बात,संतों की बात और आंवले का स्वाद बाद में पता चला है द्य आत्मदेव को एक बेटा सुख दे रहा है एक बेटा दुख द्य महाराज ने कहा बच्चों के ऊपर मां का स्वभाव कैसा होता है वही असर करता है । बच्चों पर माता पिता को नियंत्रण रखने की जरूरत है द्य बेटियों को सही शिक्षा देने की जरूरत है द्य धुंधूकारी बुरे कार्य करने लगा । एक दिन पांच स्त्रियों में फंस गया, पांच स्त्रियां शब्द,स्पर्श,रूप,रस और गंध । धुंधूकारी की अकाल मौत होने के कारण वह प्रेत बनकर भटकता हे उसकी आत्मा बांस में बैठी थी और सात गांठ से बंधा हुआ था भागवत कथा सुनने से उसका उद्धार हुआ ।
संयोजक विठ्ठल वैष्णव ने बताया कि कथा के प्रथम दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर कथा श्रवण का लाभ लिया। आयोजन को लेकर गोकुल विलेज कॉलोनी सहित आसपास के क्षेत्र में भक्तिमय माहौल बना हुआ है। शनिवार को कथा में भगवान विष्णु एवं बालक ध्रुव के प्रसंग का विस्तार से वर्णन किया जाएगा। कथा रोजाना शाम 4 से 7 बजे तक चल रही है ।

By Udaipurviews

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