देश में आईएलडी से प्रतिवर्ष लगभग 45 हजार मौत एवं डेढ़ लाख नये मरीज आ रहे
रक्तदान शिविर में 51 यूनिट हुआ रक्तदान, सभी रक्तदाता चित्रंाश रक्तवीर से सम्मानित
उदयपुर।चित्रांश कायस्थ सभा संस्था उदयपुर एवं रोटरी क्लब उदय के संयुक्त तत्वावधान में स्वर्गीय निशा माथुर पत्नी सुनील माथुर (आरटीडीसी) की स्मृति में रविवार को हिरण मगरी सेक्टर-4 स्थित महेश सेवा समिति परिसर में सर्व समाज हेतु विशाल रक्तदान शिविर में जहंा 51 रक्तदाताआंे ने रक्तदान किया वहीं लगभग 360 लोगों ने निःशुल्क चिकित्सकीय परामर्श लिया। शिविर में विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ चिकित्सकों ने अपनी सेवाएं दी।
सुनील माथुर ने बताया कि अहमदाबाद के आर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. वीरल शाह, उदयपुर के फिजिशियन डॉ. जे.पी. सक्सेना, गैस्ट्रो विशेषज्ञ डॉ. कार्तिकेय माथुर, स्किन विशेषज्ञ डॉ. पंखुरी अग्रवाल, दर्शन डेंटल कॉलेज के पुलकित चतुर्वेदी, आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. शोभालाल औदिच्य, नेचर एंड क्योर की श्रीमती प्रीति भटनागर तथा फिजियोथैरेपिस्ट डॉ. निधि माथुर निःशुल्क परामर्श प्रदान किया। सरल ब्लड बैंक के डॉ. मोगरा ने भी रक्तदान शिविर में अपनी सेवाएं दी।
इस अवसर पर टीबी एवं श्वंास रोग विशेषज्ञ डाॅ. अतुल लुहाडिया ने आज डॉ. “श्वांस संबंधी बीमारियों का उपचार, बचाव एवं फेफड़ों को स्वस्थ रखने के उपाय” विषय पर विशेष जनजागरूकता पर जानकारी देते हुए कहा कि आज तेज रफ्तार जिंदगी में हम अक्सर बड़ी बीमारियों के बारे में तो सुनते हैं, लेकिन कुछ ऐसी गंभीर समस्याएं भी हैं जो चुपचाप हमारे आसपास पनपती रहती हैं। प्दजमतेजपजपंस स्नदह क्पेमंेम (आईएलडी) और भ्लचमतेमदेपजपअपजल च्दमनउवदपजपे (हाइपरसेंसिटिव न्यूमोनाइटिस) ऐसी ही बीमारियां हैं, जो धीरे-धीरे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती हैं।
उन्होंने बताया कि विश्व में प्रतिवर्ष 4 से 5 लाख नये मरीज आईएलडी के सामनें आ रहे है जिसमें भारत में ही करीब डेढ़ लाख मरीज है, जो हमारें लिये चिंताजनक बात है। खास बात यह है कि इनका कारण अक्सर हमारंे अपने घर का वातावरण जैसे कबूतर, सीलन और फफूंद होता है।
आईएलडी से जब फेफड़े सख्त होने लगते हैं-आईएलडी दरअसल फेफड़ों से जुड़ी करीब 200 बीमारियों का समूह है, जिसमें फेफड़ों के अंदर सूजन आ जाती है और समय के साथ वे सख्त (फाइब्रोसिस) होने लगते हैं। इसका असर यह होता है कि फेफड़े ठीक से फैल नहीं पाते और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलती। इस प्रक्रिया की शुरूआत धीरे-धीरे होती है, इसलिए शुरुआत में इसके लक्षण अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं।
हाइपरसेंसिटिव न्यूमोनाइटिसःएलर्जी से शुरू होकर गंभीर बीमारी तक-
डॉ. लुहाडिया ने बताया कि आईएलडी का एक प्रमुख रूप हाइपरसेंसिटिव न्यूमोनाइटिस है, जो बार-बार एलर्जी के संपर्क में आने से होता है। कबूतरों की बीट, पंखों की धूल या घर में जमी फफूंद इसके मुख्य कारण बन सकते हैं। आम भाषा में इसे “एलर्जी से होने वाली फेफड़ों की सूजन” कहा जा सकता है, लेकिन इसका असर काफी गंभीर हो सकता है।
कबूतरःदिखने में मासूम, लेकिन खतरा असली-शहरों में कबूतरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लोग अक्सर उन्हें दाना डालते हैं या बालकनी में रहने देते हैं, लेकिन यही आदत स्वास्थ्य के लिए जोखिम बन सकती है। कबूतरों की बीट में मौजूद फंगस और बैक्टीरिया, और उनके पंखों से निकलने वाले सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। बार-बार ऐसा होने पर शरीर में एलर्जी प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है, जो आगे चलकर गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है।
सिर्फ कबूतर ही नहीं, ये कारण भी हैं जिम्मेदार-घर में सीलन और फफूंद, कूलर या एसी की गंदी जालियां, धूल-मिट्टी, प्रदूषण, खेती या पशुओं से जुड़े जैविक कण और धूम्रपान,ये सभी कारक भी इस समस्या को बढ़ा सकते हैं। यानी खतरा सिर्फ बाहर नहीं, हमारे अपने घर के भीतर भी मौजूद है।
लक्षणः धीरे-धीरे बढ़ता खतरा-इन बीमारियों के लक्षण अचानक नहीं आते, बल्कि धीरे-धीरे सामने आते हैं,जैसे लगातार सूखी खांसी, थोड़ी मेहनत में सांस फूलना, जल्दी थकान, छाती में भारीपन और लंबे समय में उंगलियों के सिरे मोटे होना। यही कारण है कि कई बार मरीज देर से डॉक्टर तक पहुंचते हैं।
समय पर पहचान ही बचाव-इन बीमारियों की पहचान के लिए मरीज के वातावरण (एक्सपोजर हिस्ट्री) को समझना बेहद जरूरी होता है। इसके साथ एचआरसीटी स्कैन, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और जरूरत पड़ने पर अन्य जांचें की जाती हैं। इलाज में सबसे अहम कदम है इसके कारणों से दूरी बनाना। दवाओं के साथ-साथ जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी होता है।
बचावःछोटी सावधानी, बड़ा फायदा-यदि घर में कबूतर आते हैं, तो उन्हें बैठने या घोंसला बनाने से रोकें। बालकनी में जाल या स्पाइक्स लगवाना एक अच्छा उपाय है। कबूतरों की बीट साफ करते समय मास्क और दस्ताने का इस्तेमाल करें और सूखी बीट को उड़ाने के बजाय गीले तरीके से साफ करें। इसके अलावा घर में सीलन और फफूंद को खत्म करना, कूलर और एसी की नियमित सफाई करना और अच्छी वेंटिलेशन बनाए रखना भी बेहद जरूरी है।
टीकाकरण की भूमिका-आईएलडी के मरीजों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है, इसलिए फ्लू वैक्सीन हर साल और निमोनिया वैक्सीन (पीसीवी-20) एक बार लगवाना फायदेमंद होता है। इससे फेफड़ों को अतिरिक्त संक्रमण से बचाया जा सकता है।
सोच बदलने की जरूरत-कबूतरों को दाना डालना हमारी संस्कृति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जब यह आदत स्वास्थ्य के लिए खतरा बन जाए, तो हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा।
उन्हंोने कहा कि आईएलडी और हाइपरसेंसिटिव न्यूमोनाइटिस जैसी बीमारियां धीरे-धीरे बढ़ती हैं, लेकिन इनके प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान, सही इलाज और कारणों से बचाव करके इन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है।
इससे पूर्व चित्रांश कायस्थ सभा संस्था की ओर सी.एन. माथुर, सुनील माथुर, रोटरी क्लब उदय के अध्यक्ष राघव भटनागर, शालिनी भटनागर ने डाॅ. लुहाडिया का उपरना ओढ़ाकर स्वागत किया एवं अन्त में स्मृति चिन्ह प्रदान किया। इस अवसर पर संस्था की ओर से राकेश माथुर,क्लब की ओर से साक्षी डोडेजा सहित शहर के अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद थे। सभी ने इस वार्ता का आमजन के लिये काफी लाभदायक बताया।
