उदयपुर। अरावली की हरी-भरी गोद में बसी झीलों की नगरी उदयपुर में गुरुवार को हरियाली अमावस्या के ऐतिहासिक मेले का दूसरा दिन पूरी तरह से नारी शक्ति के नाम रहा। फतहसागर की पाल और सहेलियों की बाड़ी का विशाल परिसर केवल महिलाओं के लिए आरक्षित रहा। सुबह से ही जब शहर की अधिकांश महिलाएं पारंपरिक परिधानों में गाजे-बाजे के साथ पहुँचने लगीं। लोगों के हाथों में मोबाइल फोन के कैमरे ने जब फतहसागर की पाल की ओर रुख किया, तो वहां उम्र की बंदिशें टूटती नजर आईं। हर उम्र की महिलाएं और युवतियाँ बच्चों की तरह मौज-मस्ती करती कैमरे के फ्रेम में कैद हुईं। सावन की फुहारों के बीच पाइप वाले खिलौने (पीपीहरी) बजाती और खिलखिलाती महिलाओं के इस खूबसूरत पल (जैसा कि ऊपर दिख रही तस्वीर में है) को फ्रेम में उतारना मेले के बाल-सुलभ उत्साह को बयां करता है। राजस्थानी परंपरा के अनुसार लहरिया साड़ी और पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं के समूह जब एक साथ निकले, तो ऐसा लगा मानो फतहसागर के किनारे सावन का कोई विशाल चित्रपट जीवंत हो उठा हो। ढोल-नगाड़ों की थाप पर घेरा बनाकर थिरकते कदम हों या फिर चाट-पकौड़ी और राजस्थानी हस्तशिल्प की दुकानों पर लगी महिलाओं की भीड़ भी खूब रही। सास-बहू, ननद-भोजाई और बचपन की सखियों ने मेले का आनंद लिया। वर्ष 1899 में तत्कालीन महाराणा फतह सिंह द्वारा शुरू की गई और चावणी रानी द्वारा महिलाओं के लिए अलग से आरक्षित की गई यह परंपरा आज भी उतनी ही शिद्दत और उमंग के साथ कायम है। कड़े पुलिस पहरे और चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के बीच उदयपुर की महिलाओं ने बिना किसी संकोच के इस मेले का खुलकर आनंद लिया।
सहेलियों के संग सावन की रंगत, परंपरा और उल्लास की अद्भुत झलक
