भानुकुमार शास्त्री की पुण्यतिथि (24 फरवरी ) पर विशेष:-
भारतीय जनसंघ की स्थापना से लेकर जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी की यात्रा के एक कर्मठ योद्वा, संस्थापक सदस्य भानुकुमार शास्त्री संघ के साधारण स्वयंसेवक से लेकर मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, नगर कार्यवाह बाद में पार्षद, नगर परिषद् उपसभापति, विधायक, सांसद, निगम बोर्ड के अध्यक्ष व काबीना मंत्री का दर्जा उनकी लम्बी राजनैतिक यात्रा के पड़ाव रहे। लगातार संघर्ष व तत्कालीन प्रभुत्व सम्पन्न दल कांग्रेस के मुकाबले अपने दल की न्यून राजनैतिक शक्ति ने उनके मन-मानस की क्रांति को कभी मंद नही होने दिया। वे ‘भास्वान उदेष्यति’ (सूर्योदय होगा) का ध्येय वाक्य लेकर अपने मार्ग पर जुटे रहे। करीब तीन दशक से अधिक शास्त्री के सानिध्य का सौभाग्य मुझे भी मिला। समय-समय पर वे अपने संस्मरण मुझे साझा करते थे। उनमें से कुछ मुख्य संस्मरणों का उल्लेख यहां कर रहा हूं।
सन् 1925 में 29 अक्टूबर को सिंध प्रदेश के हैदराबाद (जो अब पाकिस्तान में हैं) में प्रसिद्व ज्योतिष पं. गिरिधर लाल शर्मा के घर जन्म लेने वाले बालक भानुकुमार का उदय राजनीति नभ मण्डल में उदीयमान भास्कर के रूप में हुआ। भारत-पाक विभाजन की त्रासदी के बाद शास्त्री पहले कांकरोली फिर उदयपुर आये और मेवाड को अपनी कर्मभूमि बनाकर यहीं जनसेवा में जुट गये। लगभग पैतालिस वर्षों तक मैं भानुजी से मिलने उनके उदयपुर शिवाजी नगर स्थित निवास पर जाता रहा। उनका वही कमरा, उसमें वही कुर्सिया, वही टेबल, वही अलमारी। भानुजी किसी पद पर रहे या नहीं इसका कमरे के फर्नीचर या साज सज्जा में कभी परिवर्तन नहीं आया।
मेवाड दर्शन:- शास्त्री बताते थे कि वे आजादी से पूर्व सन् 1943 में हैदराबाद (सिंध) से मेरठ (उप्र) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्ग में प्रशिक्षण लेने आये थे। वहां उनका परिचय उदयपुर निवासी सुन्दर सिंह भण्डारी से हुआ। शास्त्री को मेवाड के इतिहास की जानकारी थी। उन्होंने भण्डारीजी से उदयपुर व चित्तौड देखने की इच्छा व्यक्त की। वे उनके साथ यहां आये मेवाड की गौरवपूर्ण भूमि का दर्शन व नमन कर सिंध लौट गये। तब उन्होने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि यही मेवाड भूमि उनकी कर्मभूमि बनेगी। देश विभाजन की त्रासदी से पूर्व में सिंध में प्रधानाध्यापक थे। वहां से निर्वासित होकर अपना घर बार छोडकर यहां आना पडा। यहां आकर अपने परिवार के साथ कठिन दौर का संघर्ष प्रारम्भ किया। रामभरोसे हिन्दू होटल चलाना स्वीकार किया लेकिन अपने जीवन मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया।
अटल संकल्प:- शास्त्री ने जिस समय मेवाड में भारतीय जनसंघ का झंडा उठाया तब राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व था। तब सत्तारूढ दल के एक वरिष्ठतम नेता ने शास्त्री को कहा- ‘शास्त्रीजी तुम्हारी पार्टी इस जन्म में तो सरकार में नहीं आ सकती, आप कांग्रेस में आ जाओ, राज करोगे।’ तब शास्त्री ने दृढतापूर्वक कहा- ‘मैं भारतीय संस्कृति का उपासक हूं, मैं पुनर्जन्म में विश्वास करता हूं, इस जन्म में नहीं हुआ तो फिर जन्म लेकर अपना संकल्पपूर्ण करूंगा।’ उनके इस संकल्प की पूर्ति के दो क्षणों का साक्षी होने का मुझे सौभाग्य मिला, उनका उल्लेख करना, मैं आवश्यक मान रहा हूं। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री पद की शपथ के अवसर पर वे इतने प्रसन्न थे कि उन्होने अपने हाथों से फूलझडी व अनार जलाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। दूसरी घटना 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम के समय की है। भानुजी घर पर भाजपा नेता धर्मनारायण जोशी के साथ टीवी पर चुनाव परिणाम देखकर रहे थे। लोकसभा में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के साथ ही उनके पुराने राजनैतिक साथी व यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्रसिंह लिखारी उन्हे बधाई देने चलकर आये। दोनों की आंखों में खुशी के आसूं थे। दोनों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई, पुरानी यादे ताजा की।
लेखक, शिक्षक व ज्योतिष:- अस्थल आश्रम के मेवाड महामण्डलेश्वर महन्त मुरली मनोहर शरण शास्त्री भी सन् 50 के दशक में उनके सहपाठी रहे। उस समय संस्कृत का परीक्षा केन्द्र उदयपुर में नही होने के कारण दोनों परीक्षा देने मथुरा (उ.प्र.) गये। उदयपुर में विद्या निकेतन की स्थापना में शास्त्री की महत्ती भूमिका रही, वे स्वयं शिक्षक भी रहे। बदनोर की हवेली बदनोर ठाकुर गोपालसिंहजी (पंजाब के पूर्व राज्यपाल वी.पी. सिंह के पिताजी) से विद्या निकेतन को समर्पित कराने की प्रेरणा भी इन्हीं की थी। वे भारतीय शिक्षा प्रचार समिति के संस्थापक सदस्य रहे। शिक्षा, साहित्य, राजनीति, ज्योतिष, वेद, व्याकरण, पूजा अनुष्ठान सभी क्षेत्रों में शास्त्री की गहरी पकड थी। महाराणा अमर सिंह पर संस्कृत व पाली भाषा में लिखित ‘अमरसार’ ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद शास्त्री ने किया। शास्त्री ने बाल्यकाल में पूरी गीता कंठस्थ कर ली थी। शास्त्री के दादा जी लक्ष्मीचंद जी व पिताजी ज्योतिष के विद्वान थे । शास्त्री स्वयं भी संस्कृत व्याकरण में ज्योतिष में निष्णात थे। अपने चिर प्रतिद्वंदी मोहनलाल सुखाडिया के परिवार के कई सदस्यों की जन्म पत्रिका स्वयं शास्त्री ने बनाई।
कश्मीर व मल्लपुरम् आंदोलन:- जनसंघ की स्थापना के साथ ही भारतीय जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के आव्हान पर कश्मीर में प्रवेश के लिये पासपोर्ट की अनिवार्यता व अनुच्छेद 370 के विरोध में आंदोलन में भाग लेने सुन्दरसिंह भण्डारी के साथ कश्मीर जाने वालों में भानुकुमार शास्त्री व श्यामलाल कुमावत शामिल थे। दोनों भण्डारी जी विदाई देने आये थे, लेकिन दोनों ने देखा की भण्डारीजी अकेले जा रहे है, किसी को तो उनके साथ जाना चाहिये, तुरन्त दोनों ने वहीं से कश्मीर के लिये रवाना हो गये। दोनों वहा सात माह तक कठुआ (जम्मू) की जेल में रहे। मल्लपुरम (केरल) में भारतीय जनसंघ के आंदोलन में उदयपुर में शास्त्री व शांतिलाल चपलोत ने भाग लिया।
20 हजार रूपये के लिये डेढ माह का प्रवास:- सन् 1967 के विधानसभा चुनाव में भानुजी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के खिलाफ चुनाव लडा। मात्र 3719 वोट के अंतर से कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीते। चुनाव में शक्ति नगर नाले का निर्माण बिना टेण्डर के कराने, रेगर काॅलोनी में चुनाव के समय पट्टे बांटने व सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के विषय को लेकर भानुजी ने चुनाव के पश्चात् उन्होंने उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने चुनाव याचिका में लगे आरोपों पर प्रतिपक्षी पर कडी टिप्पणी तो की लेकिन चुनाव अवैध घोषित नहीं किया, इस आधे-अधूरे फैसले के विरूद्ध हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जाना था। इसके लिये बीस हजार रूपये की आवश्यकता थी। जनसंघ विधायक दल के तत्कालीन नेता भैरोंसिंह शेखावत से चर्चा के बाद योजना बनी। पूरे प्रकरण व कोर्ट की टिप्पणियों को पुस्तिका के रूप में छपवाकर भानुजी पूरे प्रदेश में प्रवास करें। बीस हजार पुस्तिकाएं छपवाई गई। भानुजी ने डेढ़ माह तक पूरे राजस्थान का प्रवास कर सभाओं को सम्बोधित किया। वहां उन पुस्तिकाओं का विक्रय कर एकत्र राशि से सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
राजनैतिक सद्भाव व सहिष्णुता:- 1980 में लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया व भानुजी के बीच मुकाबला था। योग से दोनों का केलवाडा में दौरा एक ही दिन तय हो गया। गांव में आमसभा का स्थान एक ही था। दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं में टकराव हो लगा। तभी सुखाडिया जी व भानुजी वहां पहुंच गये, दोनों ने बातचीत की। सुखाडिया जी पहले भाषण देगे, भानुजी बाद में । सुखाडिया जी ने कहा मैं भाषण देकर जा रहा हूं , मेरे बाद भानुजी बोलेगे मंच माइक व बिछात यही रही रहेगी। मंच का बेनर व झंडा बदलेगा। सभी लोग और कांग्रेस के कार्यकर्ता भी भानुजी को सुनकर जायें। रात को एक डाक बंगले में फिर आमने-सामने थे। कमरा भानुजी के नाम पर पहले ही बुक था। भानुजी को पता चला सुखाडिया जी आये है, उन्हे बुला लाये। दोनों ने एक ही कमरे में रात्रि विश्राम किया। विरोधियों की प्रति सहिष्णुता का इस अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है?
उदयपुर के सांसद् मोहनलाल सुखाडिया के देहावसान के बाद 1982 में लोकसभा का उपचुनाव हुआ। भानुजी उदयपुर के सांसद् रह चुके थे व 1980 में भी चुनाव लड चुके थे। इसलिये उपचुनाव में भी उनकी उम्मीदवारी स्वाभाविक थी, लेकिन कुछ वरिष्ठ नेताओं के आग्रह पर सुन्दरसिंह भण्डारी अनमने मन से यह उपचुनाव लडने का तैयार हो गयेे। भण्डारी जी के केन्द्र संगठन की योजना से वर्षों से दिल्ली में था। वे चुनाव के लिये उदयपुर आये तो रेल से उतरते ही सीधे भानुजी के घर गये, उनसे बात की और कहा मै आपके घर को अपना निवास बनाकर चुनाव लडना चाहता हूं। भानुजी ने तुरन्त सहर्ष स्वीकृति दे दी, पूरे चुनाव में भण्डारी जी भानुजी के घर में निवास बनाकर चुनाव लडे। भानुजी ने सक्रीय व महती भूमिका का निर्वाह किया। कोई नेता अपना टिकट कटने के बाद ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करे, यह घटना अद्वितीय है।
वो अंतिम भविष्यवाणीः- उन्होंने ज्योतिष गणना करके फरवरी 2018 का माह स्वास्थ्य व जीवन के लिये कठिन व दुष्कर होने की बात बता दी थी। उन्होनें कहा था-’फरवरी 2018 का माह निकलना कठिन है, यदि यह पार हो गया तो शतायु पूरी करूगां।’ इसी कारण अस्वस्थ होते ही उदयपुर से बाहर जाने यहां तक की चिकित्सालय जाने से भी मना कर दिया। परिजनों व वरिष्ठ नेता धर्मनारायण जोशी के आग्रह पर वे उदयपुर महाराणा भूपाल चिकित्सालय जाने को राजी हुए। उन्होनें कहा मुझे बाहर कहीं मत ले जाना-‘अधिकांश जीवन इस मेवाड में बिताया है, अंतिम श्वास भी यहीं लूं।’ उनका निधन 24 फरवरी 2018 को उदयपुर में हुआ। राजनीति व सार्वजनिक जीवन में शुचिता का स्मरण करते ही भानुकुमार शास्त्री का संघर्षमय, कर्मठतापूर्ण व जुझारूपन लिये व्यक्तित्व अपनी तेजोमय आभा किए दिग्दिर्शित होता है।
भानुजी का जीवन राजनीति व सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के लिए सफलता शिखर का पाथेय है। राजनीति की रपटीली राहों में उतार-चढ़ाव के मध्य स्थिर-प्रज्ञ भाव से अटल रहना, निश्चित रूप से प्रेरणास्पद है। शास्त्री राजनीति जैसे क्षेत्र में अपने आदर्श जीवन से सभी के लिये प्रेरणा-पाथेय बन गये। वे आज दैहिक रूप में हमारे मध्य नहीं है, लेकिन उनके विचार, सिद्वान्त व जीवन में वाणी व व्यवहार में एकरूपता का आदर्श हमारे मध्य प्रेरणापुंज के रूप में विद्यमान है। हम उसी प्रेरणा-पुंज के प्रकाश में अपनी राजनैतिक यात्रा को बढाने का प्रयास करेगे।
‘‘न हो देव, पीडा तुम्हे इस चिन्तना से,
हम सभी से सुनोगे तुम्हारी यशोगर्जना।
बहे नैत्र से भाव नीर धारा,
बस मदीहा यही है अश्रु पुष्पार्चना।।’’
