उदयपुर 02 मई। आलोक संस्थान सेक्टर 11 में आदि शंकराचार्य और सूरदास जयंति मनाई गई।
इस अवसर पर डाॅ. प्रदीप कुमावत ने सम्बोधित करते हुए कहा कि आदि शंकराचार्य बाल्यकाल से ही बेहद मेधावी थे। कम उम्र में ही उन्हें वेद, पुराण, रामायण और महाभारत, उपनिषद जैसे कई ग्रंथ याद हो गए थे। मेधावी होने के साथ ही आदि शंकराचार्य माता-पिता के परम भक्त थे। माना जाता है कि मां की सेवा और सम्मान के लिए शंकराचार्य जी ने गांव के दूर से बहने वाली नदी का रुख तक बदल दिया था।
उन्होंने कहा कि आदि शंकराचार्य ने धर्म की रक्षा के लिए चार धामों को संगठित करने का काम भी किया था। ये चार धाम भारत के अलग-अलग कोनों में स्थित हैं। ये चार धाम बदरिकाश्रम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ हैं। आज भी ये धाम सनातन धर्म के मुख्य संतभ हैं।
डाॅ. कुमावत ने कहा कि आदि शंकराचार्य जी ने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र, वेद पर भाष्य लिखे हैं। उनके इन प्रयासों के चलते धर्मग्रंथों का अध्ययन सरल हुआ। उनके द्वारा लिखे गए भाष्य धर्म ग्रंथों में वर्णित जटिल ज्ञान को भी आसानी से समझा देते हैं। शंकराचार्य ने दशनामी संन्यासी अखाड़ों की स्थापना भी की थी।
डाॅ. कुमावत ने सूरदास के बारे में बोलते हुए कहा कि सूरदास का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति भौतिक सीमाओं से परे होती है। अंधे होने के बावजूद, उन्होंने अपने दिल से भगवान को देखा। भक्ति साहित्य का संरक्षण – उनकी रचनाएँ हिंदी और ब्रजभाषा साहित्य की आधारशिला हैं, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करती हैं।
आलोक में आदि शंकराचार्य और सूरदास जयंति मनाई
