मृत्यु एक महोत्सव,इसे उल्लास के साथ मनायेंः सुकनमुनि

उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की ओर से सिन्धी बाजार स्थित पंचायती नोहरे में आयोजित धर्मसभा में बोलते हुए श्रमण संघीय प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने कहां की जो मृत्यु को जान लेता है वही अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है। मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। मृत्यु एक महोत्सव है। जो व्यक्ति मृत्यु शास्त्र को समझ लेता है वह आत्मा से परमात्मा बन जाता है।
मृत्यु को जानना भी एक बड़ी कला है। यह मृत्यु की कला किसी स्कूल में ना सिखाई जाती है नहीं पढ़ाई जाती है। इस मृत्यु की कला की खोज हमें स्वयं को करनी पड़ती है। आज मनुष्य मृत्यु को भूलता जा रहा है। जो मनुष्य इस दुनिया में आता है वह अपने आप को अमर ही मान बैठता है। उसके दिमाग में कतई यह नहीं होता है कि उसे एक दिन संसार छोड़कर मृत्यु लोक को जाना है। मृत्यु का भय तो है लेकिन मृत्यु कब आएगी यह तय नहीं है। इसीलिए तो मनुष्य स्वयं को अमर मानकर दिन-रात धन दौलत इकट्ठा करने में लगा रहता है। जबकि इस दुनिया में कोई अमर होकर नहीं आया है। सभी को एक दिन संसार छोड़कर जाना ही होता है।
भगवान महावीर स्वामी ने हमारे शास्त्रों में मृत्यु के बारे में कई जानकारियां प्रदान की है। हमें उन शास्त्रों का अध्ययन कर उनसे ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता है, लेकिन मनुष्य अपनी ही धुन में राम रहता है और धन दौलत कैसे प्राप्त की जा सके इसी में दिन-रात लगा रहता है। जिस जमीन के लिए आपस में रोजाना झगड़े होते हैं लोग एक दूसरे को मार काट करने पर उतारू हो जाते हैं यह जमीन मेरी है यह जमीन मेरी है।
यह जमीन कहती है कि मैं किसी की भी नहीं हूं। उन्होंने कहा कि जरा सोचो आपके दादा परदादा उनके पिता उनके पिता यानी कि कई पीढियां से जिस जमीन पर अपना हक जमाते आए थे आज वह सभी मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं और जमीन जहां है वही है। इसलिए संसार में सबसे बड़ी धन दौलत अगर कोई है तो वह अपनी आत्मा। हमें अपनी आत्मा के कल्याण के लिए हर समय धार्मिक उपक्रमों के साथ प्रभु की आराधना करना चाहिए।
डॉ.वरुण मुनि ने कहा कि आप भी अपनी मृत्यु को जीत सकते हैं। अपनी मृत्यु को जान सकते हैं और अपनी मृत्यु को महोत्सव में बदल सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपको कोई व्रत उपवास धर्म आराधना करने की भी आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति जब अपनी उम्र के ढलान पर होता है तब उसे अपने जीवन का सारा लेखा-जोखा और हिसाब किताब करना चाहिए। हमनंे जीवन में कितने पुण्य कार्य किए हैं कितने पाप कर्म किए हैं उन सभी का लेखा-जोखा हमारंे पास होना चाहिए। इस आधार पर हम मृत्यु को जीत सकते हैं और अपनी मृत्यु को महोत्सव बना सकते हैं। जो बार-बार आए वह मृत्यु कहलाती है और जो सिर्फ एक बार ही आए वह मोक्ष कहलाता है। साधु मृत्यु के लिए हर वक्त तैयार होता है। किसी भी क्षण उसे मौत आ जाए उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। संसारी जीवन के लिए मृत्यु शोक का कारण हो सकती है लेकिन साधू के लिए मौत महोत्सव के रूप में होती है। इसलिए जीवन में केवल एक ही भावना लेकर के जीना चाहिए कि हमारी आत्मा का कल्याण और आत्मा का उद्धार कैसे हो। इसी में हमारे जीवन का भी कल्याण है।

By Udaipurviews

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