विजय इन्द्रदिन्न सुरीश्वर महाराज का जन्मोत्सव मनाया
– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
– आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत बह रही धर्म ज्ञान की गंगा
उदयपुर 6 नवम्बर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में सोमवार को विशेष पूजा-अर्चना के साथ विविधि अनुष्ठान हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में परमार क्षत्रियोद्धारक कलिकाल चिंतामणि गुरु देव श्रीमद् विजय इन्द्रदिन्न सुरीश्वर का जन्म दिवस बड़े धूमधाम से तथा ठाट पाट से मनाया गया। तप-जप, अनुष्ठान, भजन, उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए जन्मदिन मनाया गया। सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने अवस्थाविक में बताया कि पिंडस्थ अवस्था, पदस्थ अवस्था एवं रुपातीत अवस्थाये तीन है। पिंडस्थ अवस्था के तीन भेद होते है – जन्म अवस्था, राज्य अवस्था, और कमय अवस्था। अवस्था मानि जीवन की घटनायें। अपने जीवन की कई घटनाओं को बरसों तक याद किया करता है। स्व अवस्था का विचार कर्मबंध का कारण है, जबकि परमात्मा की अवस्था का विचार कर्म विच्छेद का कारण है। न अवस्था का विचार मतध्यान है जब कि परमात्मा की अवस्था का विचार यह धर्म स्थान है। बाल्य अवस्था से लेकर निर्वाण तक का प्रभु का जीवन एक चमत्कार है। कहीं भी न सुनी हो, न देखी हो ऐसी अचिन्त्य घटनायें परमात्मा के जीवन में घटी है। बाल्यावस्था में जिनका जन्माभिषेक देवेन्द्रों द्वारा हुआ, युवावस्था में नरेन्द्रो द्वारा जिनका राज्याभिषेक हुआ, ऐसे शाही ठाठ के बीच भी परमात्मा का उत्कृष्ट कक्षा का उदासीन भाव! श्रमण जीवन की साधना । कैवल्य की प्राप्ति और अन्त में निर्वाण । प्रत्येक घटना बार-बार विचार करने योग्य है। परमात्मा की किस अवस्था पर किस प्रकार चिन्तन किया जाय, यह आपको अवस्थाभिक के द्वारा जानकारी दी जायेगी। परमात्मा के जन्म से लेकर निर्वाण तक की कुल पांच अवस्था ओ का विचार इस त्रिक के द्वारा करना चाहिए। बहुत हो चुके खुद के विचार अब तो सीर्फ और सीर्फ जगत्पत्ति की. परमात्मा की अवस्था का विचार करता है, चिंतन करना है – अपने मन को धर्म ध्यान में कमलीन बनाता है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
परमात्मा की अभिन्य घटनाओं को अवस्था त्रिक से चिंतन करें : साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री
