शौर्य, स्वाभिमान और बलिदान की परंपरा पर टिप्पणी से नाराज मेवाड़
उदयपुर, 6 सितंबर। मेवाड़ की धरती केवल किलों, महलों और स्थापत्य की भूमि नहीं है। यह वह भूमि है जहां सत्ता से अधिक स्वाभिमान को महत्व दिया गया, जहां पराजय को स्वीकार करने से पहले अंतिम सांस तक संघर्ष करने की परंपरा रही और जहां इतिहास के सबसे कठिन दौर में भी अस्मिता की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। यही कारण है कि मेवाड़ के जौहर और साके का उल्लेख आज भी केवल इतिहास की घटना के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और शौर्य परंपरा के रूप में किया जाता है।
ऐसे में जब जौहर जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को आधुनिक राजनीतिक या सामाजिक विमर्श के चश्मे से देखकर उन पर सवाल खड़े किए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से राजस्थान और विशेषकर मेवाड़ में भावनाएं आहत होती हैं। अपने विवादित बयानों से चर्चा में रहने का शौक रखने वाली एक महिला की ‘पद्मावत’ और जौहर के चित्रण को लेकर की गई टिप्पणी ने इसी संवेदनशील मुद्दे को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।
इतिहास संकलन समिति चित्तौड़ प्रान्त के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. विवेक भटनागर ने बयान जारी करते हुए कहा कि मेवाड़ की परंपरा में जौहर को लेकर भावनाएं अत्यंत गहरी हैं। चित्तौड़गढ़ के दुर्ग ने बार-बार ऐसे दौर देखे जब महीनों की घेराबंदी के बाद विजय की संभावना समाप्त हो गई। ऐसे समय में महिलाओं और पुरुषों ने अलग-अलग लेकिन अपने-अपने तरीके से अंतिम निर्णय लिए। महिलाओं ने जौहर किया और पुरुषों ने केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
यह इतिहास किसी एक व्यक्ति की कल्पना से निर्मित नहीं हुआ। इसके पीछे युद्धों, घेराबंदियों, सत्ता संघर्षों और उस समय की सामाजिक परिस्थितियों का लंबा इतिहास है। इसलिए जौहर की चर्चा करते समय उसके ऐतिहासिक संदर्भ को हटाकर केवल आज की दृष्टि से उसका मूल्यांकन करना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
चित्तौड़गढ़ के इतिहास में तीन बड़े साके विशेष रूप से स्मरण किए जाते हैं।
पहला साका 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के चित्तौड़ अभियान से जुड़ा है। राणा रतन सिंह के काल से संबंधित इस प्रसंग ने चित्तौड़ के इतिहास में एक ऐसी गाथा को जन्म दिया जो सदियों से लोकस्मृति का हिस्सा है।
दूसरा साका 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के दौरान हुआ। इस दौर में रानी कर्णावती और चित्तौड़ की महिलाओं के जौहर का उल्लेख मिलता है।
तीसरा साका 1567-68 में अकबर के चित्तौड़ अभियान के दौरान हुआ। जयमल और पत्ता के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने मुगल सेना का सामना किया। दुर्ग के पतन से पहले जौहर और उसके बाद केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध में उतरने की परंपरा ने इस घटना को मेवाड़ के इतिहास में अमर कर दिया।
जौहर को समझने के लिए एक बात स्पष्ट करनी होगी—उस दौर के राजपूत समाज में युद्ध केवल सेनाओं के बीच संघर्ष नहीं था। किसी दुर्ग की पराजय का अर्थ उसके भीतर रहने वाले लोगों का शत्रु के हाथों पड़ना भी हो सकता था। मध्यकालीन युद्धों में बंदी बनाए जाने, दास बनाए जाने और महिलाओं के साथ हिंसा के ऐतिहासिक उदाहरण मिलते हैं।
इसी भयावह युद्ध-परिस्थिति में जौहर जैसी परंपरा विकसित हुई। इसे केवल ‘आत्मदाह’ कहकर छोड़ देना उस पूरे ऐतिहासिक संदर्भ को छोटा कर देना है, जिसके भीतर इन घटनाओं को समझना चाहिए। और यहीं से आधुनिक बहस और ऐतिहासिक स्मृति के बीच टकराव पैदा होता है।
आज के दौर में यह कहना बिल्कुल उचित है कि किसी भी महिला को यौन हिंसा के बाद जीवित रहने के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। जीवन बचाना कायरता नहीं है और किसी पीड़िता की गरिमा उसके जीवित रहने से कम नहीं होती।
लेकिन इसी आधुनिक सिद्धांत को आधार बनाकर सदियों पहले युद्ध की आग में अपने सामने उपलब्ध विकल्पों के बीच निर्णय लेने वाली महिलाओं को अपमानित करना भी उचित नहीं हो सकता।
इतिहास को समझना और इतिहास का न्याय करना—दो अलग बातें हैं।
मेवाड़ की वीरांगनाओं ने जिस सामाजिक, राजनीतिक और युद्धकालीन परिस्थिति में निर्णय लिया, उसे समझे बिना उनके निर्णय पर आज की भाषा में टिप्पणी करना ऐतिहासिक संदर्भों को नजरअंदाज करना होगा।
और यही वह बिंदु है जहां मेवाड़ की भावनाएं सबसे अधिक संवेदनशील हो जाती हैं।
मेवाड़ की शौर्यपूर्ण परंपरा किसी राजनीतिक दल या किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं है। महाराणा प्रताप, पन्नाधाय, रानी पद्मिनी, रानी कर्णावती और चित्तौड़ के अनगिनत ज्ञात-अज्ञात वीर-वीरांगनाओं की स्मृति इस भूभाग की सामूहिक विरासत है।
इस विरासत से असहमति हो सकती है। जौहर जैसी परंपरा की आधुनिक दृष्टि से आलोचना भी की जा सकती है। लेकिन आलोचना और उपहास के बीच एक स्पष्ट सीमा होती है। उस सीमा का सम्मान होना चाहिए।
मेवाड़ की शौर्यगाथाओं को लेकर किसी भी तरह की ऐसी टिप्पणी, जिसमें बलिदान देने वाली महिलाओं के साहस, उनके निर्णय या उनकी ऐतिहासिक स्मृति की खिल्ली उड़ती प्रतीत हो, स्वाभाविक रूप से विरोध पैदा करेगी।
कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि जौहर पर भावनात्मक बहस से आगे बढ़कर गंभीर ऐतिहासिक विमर्श हो। इतिहासकार स्रोतों की पड़ताल करें, साहित्य और लोक परंपरा के बीच अंतर स्पष्ट करें और मध्यकालीन युद्धों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने रखें।
लेकिन इस विमर्श के नाम पर मेवाड़ की शौर्य परंपरा को कटघरे में खड़ा करना या बलिदान की उस स्मृति को हल्का करके देखना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
मेवाड़ ने सदियों तक आक्रमणों का सामना किया है। चित्तौड़ की प्राचीरों ने युद्ध देखे हैं, रक्त देखा है, जौहर की अग्नि देखी है और केसरिया पहनकर रणभूमि में उतरते योद्धाओं को देखा है।
आज उन घटनाओं को देखने का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन उनका ऐतिहासिक अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता।
सख्त संदेश यही है—मेवाड़ की परंपराओं पर प्रश्न कीजिए, शोध कीजिए, बहस कीजिए; लेकिन उन वीरांगनाओं के बलिदान की खिल्ली उड़ाने की हिमाकत मत कीजिए, जिनकी स्मृति सदियों से इस भूमि की सामूहिक चेतना में जीवित है।
क्योंकि इतिहास पर असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन किसी समाज की वीरगाथाओं और बलिदान की स्मृति का उपहास करना संवेदनशीलता की सीमाओं को लांघना है।
मेवाड़ अपने इतिहास पर गर्व करता है—और अपने इतिहास के सम्मान की आवाज उठाना उसका अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
इतिहास संकलन समिति, चित्तौड़ प्रान्त
