एकादशी व्रत कर मन के विकारों पर विजय पाने का संकल्प लें: प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें
उदयपुर, 6 सितम्बर। व्रत केवल भोजन छोड़ने का नाम नहीं, बल्कि उन विकारों को छोड़ने का संकल्प है, जो मनुष्य को भीतर से कमजोर बनाते हैं। एकादशी आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का अवसर है। नारायण सेवा संस्थान के ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने एकादशी के पौराणिक प्रसंगों के माध्यम से जीवन को सरल, संयमित और सार्थक बनाने के संदेश साझा किए।
उन्होंने मुर दैत्य और एकादशी देवी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कथा बाहरी शत्रु से अधिक मन के भीतर छिपे क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता पर विजय पाने की प्रेरणा देती है। महर्षि मेधा के प्रसंग से क्रोध नियंत्रण का संदेश देते हुए उन्होंने उपस्थित जनों को क्रोध नहीं करने का संकल्प दिलाया। उन्होंने कहा कि सच्ची श्रद्धा वही है, जो पूजा से निकलकर हमारे व्यवहार में दिखाई दे।
राजा रुक्मांगद और मोहिनी की कथा से उन्होंने सिद्धांतों पर अडिग रहने तथा बिना पूरी तरह विचार किए किसी को वचन न देने की सीख दी। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, व्यक्ति को अपने मूल्यों पर कायम रहना चाहिए और स्वयं को बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
प्रशांत अग्रवाल ने आज अहमदाबाद में हुए नारायण मॉड्यूलर आर्टिफिशियल लिंब फिटमेंट कैंप का उल्लेख करते हुए कहा कि 335 दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंगों के साथ नई उम्मीद, आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का अवसर मिला है। उन्होंने कैंप और सजीव कार्यक्रम के माध्यम से सेवा से जुड़े सभी सहयोगियों का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सेवा के इस यज्ञ में हर सहयोग किसी के जीवन में नई रोशनी बनता है। उन्होंने कहा कि दूसरों के सुख और कल्याण के लिए किए गए प्रयास जीवन को सार्थक बनाते हैं।
अग्रवाल ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से एकादशी को पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों और मन – इन 11 पर संयम से भी जोड़ा जाता है। इसलिए इसका असली अर्थ केवल एक दिन अन्न से दूरी बनाना नहीं, बल्कि वाणी, विचार, क्रोध, इच्छाओं और कर्मों पर नियंत्रण रखते हुए सेवा, परोपकार और सदाचार को जीवन का हिस्सा बनाना है। उन्होंने कहा कि प्रयास हमेशा खुद को बदलने का होना चाहिए, क्योंकि वास्तविक सुधार की शुरुआत भीतर से होती है।
By Udaipurviews

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