संसार की संपत्ति यहीं रह जाएगी, शास्त्र ज्ञान आत्मा को परमात्मा से जोड़ेगा

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में आयोजित आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने बुधवार को कहा कि जिस प्रकार ऊपर जाने के लिए सीढ़ियों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मा के गुणों को निखारने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी गुणों की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। संसार का वैभव और सामान यहीं रह जाना है, जबकि शास्त्रों का ज्ञान आत्मा को परमात्मा की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
साध्वी श्रीजी ने श्रावक-श्राविका और सामान्य श्रद्धालुओं के बीच अंतर बताते हुए कहा कि जीवन में धर्म और संस्कारों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें आचरण में उतारना आवश्यक है। उन्होंने एक प्रसंग के माध्यम से संसार की अस्थिरता को समझाया। उन्होंने बताया कि एक बार संघ एक महल के सामने पहुंचा तो संत ने वहां के चैकीदार से कहा कि हम इस धर्मशाला में ठहरेंगे। चैकीदार ने कहा कि यह धर्मशाला नहीं, महल है। संत ने कहा कि धर्मशाला आने-जाने के लिए होती है और महल टिके रहने के लिए, लेकिन 15 वर्ष पहले जब मैं यहां आया था तब आपके पिता थे, आज आप हैं और 15 वर्ष बाद आऊंगा तो आपका उत्तराधिकारी होगा। जब व्यक्ति ही स्थायी नहीं है तो यह महल स्थायी कैसे हो सकता है।
साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने कहा कि देवों के लिए सौ वर्ष का जीवन भी क्षणभर के समान है। देवों का जीवन हजारों वर्षों का होता है, फिर भी वह भी स्थायी नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य का मकान भी धर्मशाला के समान है। जिन दीवारों को देखकर आज हम खुश होते हैं, वे कभी किसी और की थीं और आने वाले समय में किसी और की हो जाएंगी। इसलिए मनुष्य को भौतिक सुख-सुविधाओं के बजाय आत्मिक गुणों को विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बच्चों को अच्छे संस्कार देना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यदि माता-पिता गर्भ से ही बच्चे में परोपकार, दया और जैन संस्कारों के बीज बोएं तो वही बच्चा महावीर जैसे महान व्यक्तित्व के मार्ग पर चल सकता है। वहीं संस्कारों का अभाव बच्चे को गलत दिशा में भी ले जा सकता है। गुरु बाद में मिलते हैं, लेकिन जीवन की पहली पाठशाला माता-पिता ही होते हैं। बच्चे सबसे पहले अपने माता-पिता से ही सीखते हैं, इसलिए उनका आचरण भी संस्कार निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रवचन के दौरान साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मयरुचि श्रीजी ने भावपूर्ण भक्ति गीत प्रस्तुत किए।

By Udaipurviews

Related Posts

error: Content is protected !!