उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने मंगलवार को आचार और विचार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार और विचार जीवन रूपी पक्षी के दो पंख हैं। दोनों में संतुलन रहेगा तभी जीवन सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। आचार के साथ विचार नहीं हो तो आचरण लंबे समय तक टिक नहीं सकता और विचार के बिना आचार अधूरा रह जाता है।
साध्वी श्री ने आचारांग सूत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें आचार की बात कही गई है। भगवान आदिनाथ से लेकर जिन शासन तक अनादिकाल से जीवन में आचरण की परंपरा चली आ रही है। इसी परंपरा ने धर्म और जीवन मूल्यों को जीवंत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि जीवन में अच्छे आचार को बनाए रखने के लिए शुद्ध विचार आवश्यक हैं। इसलिए जीवन की पवित्रता के लिए आचार और विचार दोनों जरूरी हैं।
साध्वी श्री ने आयुष्य कर्म और देव लोक की अवधारणा समझाते हुए कहा कि मनुष्य का आयुष्य कर्मों से बंधा हुआ है। कर्म हमारे साथ चलते हैं और उनके परिणामों से बचना संभव नहीं है। वहीं देवों के जन्म की प्रक्रिया अलग होती है। देवों का जन्म शय्या पर होता है और जब उस शय्या पर चादर फूलने लगती है तो आसपास के देवों को संकेत मिलता है कि किसी देव का जन्म होने वाला है।
उन्होंने स्वर्ग और नरक की अवधारणा तथा कर्मों के प्रभाव पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। साध्वी श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने कर्म, आचार और विचार तीनों को शुद्ध रखने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के दौरान साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमनरुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मयरुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किए। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
