उदयपुर। नंद चतुर्वेदी फाउंडेशन द्वारा नंद चतुर्वेदी के 103 वे जन्मदिन पर आयोजित दसवा नंद चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान 21 अप्रैल को कोटा खुला विश्विद्यालय के केन्द्रीय सभागार मे प्रो. कैलाश सोडानी की अध्यक्षता मे आयोजित किया गया।
कार्यक्रम मे मुख्य वक्ता गुजरात केन्द्रीय विश्वाविद्यालय के प्रो. संजीव कुमार दुबे रहे। कार्यक्रम का प्रारम्भ नंद चतुर्वेदी की तस्वीर पर पुष्पांजलि और डॉ. रश्मि बोहरा के स्वागत भाषण से हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. संजीव कुमार दुबे ने “शिक्षा की भाषा और भारतीय भाषाओ की चुनोतियाँ “ विषय पर अपना व्याख्यान आरंभ करते हुए नंद चतुर्वेदी की शिक्षा व्यवस्था से अपेक्षाओं का ज़िक्र करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति मूल भावना को उसके अनुकूल बताया। नंद जी शिक्षा को हिंदुस्तानी बनाना चाहते थे। वर्तमान शिक्षा नीति भारतीयता पर बल देती है।
उन्होंने बहुविषयकता, बहुभाषिकता और लचीलेपन को नयी शिक्षा नीति का मुख्य बिंदु कहा। “पढ़ें फ़ारसी बेचें तेल” की कहावत का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में अधिगम परिणाम आधारित शिक्षा द्वारा प्राप्त ज्ञान के वास्तविक जीवन मे उपयोग पर बल दिया। उन्होंने भाषा का शिक्षण और भाषा मे शिक्षण के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि विद्यार्थी को अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाएं सीखने का अवसर दिया जाना चाहिए पर उसकी शिक्षा का माध्यम राज्य की राजभाषा या क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि भाषा हमें जोड़ती तो है लेकिन अस्मिता से जुड़ कर भाषा हमें बाटती भी हैस आठवीं अनुसूची में शामिल बड़ी भाषाओं के अंतर्गत कई मातृभाषाएँ हैं। हिंदी अकेले 56 मातृभाषाओं का प्रतिनिधित्व करती है। हमें सजग भी रहना है कि हमारी मुख्य भाषाएं अनेक भाषिक अस्मिताओं में बँट न जाएँ। ये हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
प्रो कैलाश सोडानी ने कहा कि भाषा वेशभूषा और भोजन हमारी पहचान है और हम यदि अपनी पहचान भूलेंगे तो हरा व्यक्तित्व ही बेकार है, जो आजादी हमने प्राप्त कि वाह राजनीतिक आजादी थी मानसिक आजादी आज भी नहीं मिली है, आज भी हम उस गुलामी के परिणाम भोग रहे है। व्यक्ति जब तक पिता नही बनता वह अपने लिए जीता है और जब पिता बन जाता है तो अपने पुत्र के लिए जीता है। चतुर्वेदी परिवार का यह व्याख्यान माला क्रम साधुवाद का पात्र है । आपने बताया कि विद्यार्थी की स्कूल शिक्षा उसकी मातृ भाषा मे होनी चाहिए या आज की नयी शिक्षा नीति भी कहती है। आपका मानना है कि शोध की महत्ता उसकी मातृ भाषा मे होना ही है।
दसवां नन्द चतुर्वेदी स्मृति व्याख्यान आयोजित
