उदयपुर, 22 सितंबर। नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आस्था चैनल पर प्रसारित ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम में जलझूलनी एकादशी पर भगवान श्रीनाथजी, साक्षी गोपाल और भक्त सेना से जुड़े भक्तिपूर्ण प्रसंग सुनाए गए।उन्होंने बताया कि करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व औरंगजेब के शासनकाल में ब्रज के मंदिरों को तोड़े जाने लगे। गोवर्धन से श्रीनाथजी को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए सेवकों ने बैलगाड़ी से यात्रा शुरू की। आगरा, कोटा, बूंदी, पुष्कर, किशनगढ़ होते हुए रथ जोधपुर के पास चौपासनी तक पहुँचा। कई स्थानों पर शरण की प्रार्थना की गई, लेकिन भय के कारण स्थायी आश्रय नहीं मिला। करीब ढाई वर्ष बाद महाराणा राजसिंह ने श्रीनाथजी को मेवाड़ लाने का निर्णय लिया। सिहाड़ गाँव के पास बनास नदी के किनारे रथ का पहिया कीचड़ में धंस गया। प्रयासों के बावजूद पहिया नहीं निकला। इसे श्रीनाथजी की इच्छा मानकर वहीं मंदिर बनाया गया। यही सिहाड़ आगे चलकर नाथद्वारा के नाम से प्रसिद्ध हुआ।दूसरे प्रसंग में साक्षी गोपाल की कथा सुनाई गई। तीर्थयात्रा में एक निर्धन युवक ने वृद्ध ब्राह्मण की सेवा की। वृंदावन में वृद्ध ने गोपालजी के सामने अपनी बेटी का विवाह युवक से करने का वचन दिया, लेकिन घर लौटकर परिवार के दबाव में मुकर गया। पंचायत में युवक ने गोपालजी को गवाह बताया। वृंदावन से गोपालजी उसके पीछे चल पड़े और पीछे मुड़कर न देखने की शर्त रखी। ओडिशा पहुंचकर युवक ने पीछे देखा तो गोपालजी वहीं रुक गए और पंचायत में वचन की गवाही दी। बाद में वे वहीं विराजमान हुए और ‘साक्षी गोपाल’ कहलाए।
आगे की कथा में भक्त सेना की कथा सुनाते हुए बताया कि संतों की सेवा में व्यस्त होने के कारण सेना राजमहल देर से पहुँचे। कथा के अनुसार भगवान सेना का रूप धरकर पहले ही राजा की सेवा कर चुके थे। राजा ने तेल की कटोरी में उनका चतुर्भुज स्वरूप देखा और बाद में सेना के चरणों में प्रणाम कर उन्हें गुरु माना। कथा में बताया गया कि सेना स्वामी रामानंद के शिष्य बने और उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित है।
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