हरित आधारभूत ढांचों के विकास, प्राचीन जल संरक्षण के तरीकों को अपनाने की जरूरत: प्रो. सारंगदेवोत

विद्यापीठ – 17वां विशेष दीक्षांत समारोह
  – जल पुरूष राजेन्द्र सिंह को डी.लिट की उपाधि से नवाजा
– कहीं और नहीं, अपने घर में ही हमें ढूंढने होंगे बाढ़ और सूखाड. के समाधान: डॉ राजेन्द्रसिंह
मानव को महामानव बनाना शिक्षा का उददेश्य – प्रो. सारंगदेवोत
उदयपुर 21 जुलाई / जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय के 17वें विशेष दीक्षांत समारोह में शुक्रवार को प्रतापनगर स्थित आईटी सभागार में मैग्सेसे पुरस्कार विजेता व सूखा एवं बाढ के विश्व जन आयोग , स्वीडन के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र सिंह को जल, जंगल, जमीन को बचाने के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए डी. लिट की उपाधि से नवाजा गया। समारेाह के मुख्य अतिथि इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस मटेरियल स्वीडन के निदेशक डॉ. आशुतोष तिवारी, विशिष्ठ अतिथि कुल प्रमुख भंवर लाल गुर्जर, पीजी डीन प्रो. जीएम मेहता थे, जबकि अध्यक्षता कुलाधिपति प्रो. बलवंतराय जानी ने की। कुलपति कर्नल प्रो एस.एस सारंगदेवोत अतिथियों का स्वागत किया। रजिस्ट्रार तरूण श्रीमाली ने संचालन किया। इससे पूर्व अतिथियों ने मनीषी पं जनार्दनराय नागर की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया तत्पश्चात आकदमिक प्रोसेशन निकाला गया जिसमें डीन, डायरेक्टर्स आदि मौजूद थे।
विशेष दीक्षांत में डी-लिट की उपाधि से अलंकृत जल पुरूष डॉ राजेंद्रसिंह ने विद्या और अविद्या के भेद को समझाते हुए कहा कि सतयुग में अविद्या नहीं थी क्योंकि तब ना तो काई शासक बनाना चाहता था ना ही कोई किसी को कंट्रोल करना चाहता था। उसके बाद के युगों में जब शासक बनने व कंट्रोल करने की प्रवृत्ति आई, तब अविद्या का व्यापक प्रसार हुआ। आजकल की साइंस का पूरा दिमाग केवल कंट्रोल करने में रहता है। जबकि हमें साथ जीने, परस्पर व्याप्त होने और दोस्ताना होने का विज्ञान सीखना है। जल पुरूष ने दिल्ली की बाढ का उदाहरण देते हुए कहा कि इसे मानवीय प्रयासों से ही पानी डायवर्ट कर रोका जा सकता था लेकिन नहरों में मलबा आ जाने के डर से ऐसा नहीं किया गया। दरअसल हमारी शिक्षा सबको कंट्रोल कर रही है। नदी का भी अधिकार है, उसकी जमीन को आजाद करने का काम आज आखिर कौन कर रहा है। दिल्ली में 22 किलोमीटर में 18 नाले थे जिसमें वर्षा का जल बह कर निकल जाता था। जब उसमें अवरोध हुआ तो विनाशलीला दिखाई दी। डॉ सिंह ने कहा कि आज पूरी दुनिया में प्रकृति पर संकट है। अफ्रीका, वेस्टर्न एशिया के लोग जब पानी से गुजरते हुए विस्थापित होकर यूरोप में आते हैं तो उन्हें क्लाइमेट रिफ्यूजी कहा जाता है। बाढ और सूखाड के समाधान हमें कहीं और नहीं, अपने घर में ही ढूंढने हैं। ये विद्या के सोल्यूशन हैं विद्या हमें जहां पर हम हैं, वहीं पर सोल्यूशन देती है। आज का पर्यावरणीय संकट डराने वाला है। इसका समाधान ढूंढने के लिए हम सबको अपने ज्ञानतंत्र के इंडीजीनस नॉलेज सिस्टम में इनोवेशन एक्सप्लोर करने होंगे। मन में अपने रूट से अपनी चीजों को जान कर सोल्यूशन एक्सप्लोर करना ही सच्चा समाधान है। याद रखें कि  प्रकृति कभी किसी का लालच पूरा नहीं करती, यह जरूरतों को पूरा करती है। जल पुरूष ने राजा जनक, भगवान श्री कृष्ण, चंबल के डाकुओं का पुनर्वास सहित अन्य प्रसंगों के माध्यम से बताया कि पौरूष के पीसने से हम प्रकृति से साम्य स्थापित कर बडा बदलाव ला सकते हैं।

कुलपति प्रो एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि विश्व जल संकट का सामना कर रहा है। 2030 तक पेयजल की उपलब्धता मांग पूति के मुकाबले 40 प्रतिशत अधिक हो जाएगी। यूएन के समावेशी विकास के लक्ष्य संख्या-6 में सब तक पानी पहुंचाने का लक्ष्य है मगर यह भी गौरतलब है कि गरीबी, अच्छा स्वास्थ्य, एनर्जी सहित अन्य सभी लक्ष्य पानी पर ही आधारित है। जनसंख्या में विश्व में हमारा योगदान 20 प्रतिशत है जबकि पानी हमारे पास केवल 4 प्रतिशत है। हरित आधारभूत ढांचों के विकास, प्राचीन जल संरक्षण के तरीकों को अपनाने की जरूरत है। दुनिया में हर चार में से एक व्यक्ति पानी की समस्या का सामना कर रहा है। हमने 72 प्रतिशत जल स्त्रोतों को खर्च कर दिया है। इजराइल में 85 प्रतिशत पानी री साइकिल हो रहा है। भारत में इंदौर के लोगों ने जीवटता दिखा कर 20 करोड रूपए इकटठा कर शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। 70 प्रतिशत बीमारियां जल जनित हैं। जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य व पर्यावरणीय संकट आपस में जुडे हुए हैं। उन्होंने डा राजेंद्रसिंह के जीवन दर्शन को नमन करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से हमारे देश ही नहीं पूरे विश्व को दिशा मिली है। उन्होंने कहा कि मानव महामानव बनाना शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। हमें प्रकृति को बचाते हुए विकास करना होगा।

मुख्य अतिथि इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस मटेरियल स्वीडन के निदेशक डॉ. आशुतोष तिवारी ने कहा कि पर्यावरणी समस्याओं के समाधान के लिए हमें अपने स्तर पर आस-पास ही समस्या को जाना, पता लगाना व उसमें विज्ञान को मिला कर समाधान की पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनाना है। दुनिया के सभी देश खास कर यूरोपीय देश अपने-अपने हरित कार्बन लक्ष्य रख रहे हैं। हमें भी छोटे से छोटे स्तर पर ऐसे ही लक्ष्यों को रख कर कार्य करना है। आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात हो रही है। क्वांटम तकनीक पर दुनियाभर में शोध हो रहा है। क्यांेकि तकनीक के सहारे चलने के लिए आने वाले समय में हमें असीमित उर्जा की जरूरत है। ऐसे में मैं इंडीजीनियस एआई का विचार देता हूं। हम खुद अपने लक्ष्य तय करें और उस पर समग्रता के साथ आगे बढें। इंटरनेशनल रिसर्च क्वांटम तकनकी पर रिसर्च कर रही है। प्लास्टिक बनाने वाले वैज्ञानिक ने जब आविष्कार किया तब कहा कि इससे उर्जा की बडी बचत होगी मगर यह भी कहा कि सिंगल यूज ही किया जाए तभी सही होगा। दुनिया ने उनकी दूसरी बात पर गौर ही नहीं किया व आज हम प्लास्टिक के विनाश झेल रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिकता के साथ ही हर निचले स्तर पर जन भागीदारी की जरूरत है।
कुलाधिपति प्रो बलवंतराय जानी ने कहा कि हमें प्रकृति ने बहुत कुछ दिया है। सभी समस्याओं का समाधान भी प्रकृति की ओर वापस लौटने पर ही हो सकेगा। वेदों में वर्णित ज्ञान की पुनर्मीमांसा वर्तमान संदर्भों में हो। राजेंद्रसिंह जैसे स्वप्न दृष्टा को डी.लिट प्रदान कर हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
कुल प्रमुख भंवरलाल गुर्जर ने कहा कि ईश्वर ने हमें सब कुछ दिया है लेकिन हमें उसका सही तरीकों से उपयोग नहीं कर पा रहे हे।  बारिश के पानी को सूखाग्रस्त क्षे़त्रों में डायवर्ट करने, जल संरक्षण में जन सहभागिता व जवाबदेही की बात कही।  दीक्षांत समारोह का समापन राष्ट्रगान से हुआ।
समारोह में पीठ स्थविर डॉ. कौशल नागदा, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. जीवन सिंह खरकवाल, प्रो. गजेन्द्र माथुर, डॉ. कला मुणेत, प्रो. मंजु मांडोत, डॉ. पारस जैन, डॉ. अवनीश नागर, . युवराज सिंह राठौड़, डॉ. हेमेन्द्र चौधरी, डॉ. लाला राम जाट, डॉ. भवानी पाल सिंह राठौड़, डॉ. दीलिप सिंह चौहान, डॉ. राजन सूद, डॉ. शैलेन्द्र मेहता, सुभाष बोहरा, डॉ. धमेन्द्र राजौरा, डॉ. राजन सूद, डॉडॉ. सपना श्रीमाली, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. रचना राठौड़, डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ. अमी राठौड, सहित डीन डायरेक्टर उपस्थित थे।
उक्त जानकारी नीति सचिव कृष्णकांत कुमावत ने दी।

By Udaipurviews

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