उदयपुर, 17 सितम्बर। नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा का गुरुवार को विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर समापन हुआ। कथा में शिल्प, कर्म, संयम, सेवा और जीवन में सकारात्मक शक्तियों के सदुपयोग से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से जीवनोपयोगी संदेश दिए गए।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि संसार में कोई भी वस्तु अपने आप नहीं बनती। हर निर्माण के पीछे किसी न किसी कारीगर के श्रम, कौशल और समर्पण की भूमिका होती है। इसलिए निर्माण करने वाले हाथों का सम्मान करना ही विश्वकर्मा पूजा का वास्तविक भाव है।
उन्होंने विश्वकर्मा जी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि संज्ञा सूर्यदेव के तेज को सहन नहीं कर पा रही थीं। समस्या सामने आने पर विश्वकर्मा ने केवल सहन करने की सलाह नहीं दी, बल्कि समाधान खोजा। सूर्यदेव के तेज को कम करने और उससे सुदर्शन चक्र, त्रिशूल सहित दिव्य अस्त्रों के निर्माण का प्रसंग बताता है कि किसी शक्ति को नष्ट करने के बजाय उसका उचित उपयोग किया जाए तो वही लोककल्याण का साधन बन सकती है।
स्वर्ण लंका के प्रसंग से उन्होंने लालच और मोह से बचने की सीख दी। उन्होंने बताया कि भगवान शिव और माता पार्वती के लिए विश्वकर्मा ने स्वर्ण लंका का निर्माण किया था। गृह प्रवेश के पुरोहित बने रावण ने दक्षिणा में वही लंका मांग ली। भगवान शिव ने वचन निभाते हुए उसे लंका दे दी, लेकिन बाद में वही स्वर्ण नगरी रावण के अहंकार और विनाश की प्रतीक बनी। उन्होंने कहा कि निर्माण करना श्रेष्ठ है, लेकिन निर्मित वस्तु के मोह में बंध जाना विनाश का कारण बन सकता है।
महाभारत की मयसभा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि दुर्योधन के गिरने पर हुई हंसी ने उसके मन में अपमान और ईर्ष्या को और गहरा किया। किसी के गिरने पर हंसने के बजाय हाथ बढ़ाना चाहिए, क्योंकि छोटी-सी कटुता भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।
उन्होंने कहा कि विश्वकर्मा जयंती औजारों और मशीनों की पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि श्रम और हुनर का सम्मान करने का अवसर है। बढ़ई, लोहार, राजमिस्त्री, दर्जी, कुम्हार, सुनार सहित सभी कारीगर समाज के निर्माता हैं। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग और सहायक उपकरण देकर आत्मनिर्भर बनाना भी मानव जीवन को पुनः संवारने का कार्य है। यही सेवा विश्वकर्मा पूजा के भाव को सार्थक करती है।
