अनीति का धन संतानों की बुद्धि को बिगाड़ता है : पुष्कर दास महाराज

उदयपुर व्यूज़ | ताजा खबरें

– बच्चों को संस्कारयुक्त शिक्षा देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता
उदयपुर, 22 अप्रेल। विवेक नगर सेक्टर-3 स्थित विवेक पार्क में चल रही संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे दिन पूज्य श्री पुष्कर दास महाराज ने अपने ओजस्वी वचनों से श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि “अनीति से अर्जित धन केवल परिवार को नहीं, बल्कि आने वाली संतानों की बुद्धि और संस्कारों को भी दूषित कर देता है।” इसलिए मनुष्य को सदैव धर्म और नीति के मार्ग पर चलकर ही जीवन यापन करना चाहिए। महाराज ने सत्संग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग वह पवित्र स्थान है जहाँ सभी शास्त्रों और ग्रंथों का सार सहज रूप में प्राप्त होता है। ऋषि-मुनियों ने भी सत्संग को जीवन का आधार माना है। कथा श्रवण को उन्होंने सबसे श्रेष्ठ कार्य बताते हुए कहा कि महापुरुषों ने ग्रंथों की रचना केवल लोक कल्याण के उद्देश्य से की है। उन्होंने परिवार और संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि जो शिष्य अपने गुरु की डांट सहन नहीं कर सकता, और जो संतान अपने माता-पिता की सीख को स्वीकार नहीं करती, वह जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकती। जीवन में अनुशासन और संस्कार अत्यंत आवश्यक हैं। कथा के प्रथम अध्याय का वर्णन करते हुए महाराज ने आत्मदेव की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि आत्मदेव संतान न होने के कारण अत्यंत दुखी थे। एक दिन उनके घर एक संत आए और उन्हें प्रसाद स्वरूप फल दिया। आत्मदेव की पत्नी धुंधुली गर्भ के कष्ट से बचना चाहती थी, इसलिए उसने उस प्रसाद का सेवन नहीं किया और उसे गाय को खिला दिया। वहीं अपनी निर्धन बहन को धन देकर उसका पुत्र अपने घर ले आई। समय आने पर गाय ने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया, जिसका शरीर मनुष्य जैसा और कान गाय जैसे थे। उसका नाम गोकर्ण रखा गया। गोकर्ण संत प्रसाद से उत्पन्न होने के कारण अत्यंत धार्मिक, विद्वान और साधु स्वभाव का था। दूसरी और धुंधुली का लाया हुआ बालक धुंधूकारी अत्यंत दुष्ट और उग्र स्वभाव का निकला। महाराज ने समझाया कि बच्चों के व्यक्तित्व पर सबसे अधिक प्रभाव माता के स्वभाव का पड़ता है। एक ही घर में दो बच्चों के अलग-अलग संस्कार इसका उदाहरण हैं—एक गोकर्ण जो धर्म और साधना में लीन रहा, और दूसरा धुंधूकारी जो बुरे कर्मों में लिप्त हो गया। उन्होंने आगे बताया कि धुंधूकारी बुरे संग और कुकर्मों में इतना लिप्त हो गया कि अंततः: उसकी अकाल मृत्यु हो गई और वह प्रेत योनि में भटकने लगा। उसकी आत्मा बांस में सात गांठों में बंधी हुई थी। अंत में जब गोकर्ण ने भागवत कथा का आयोजन किया और धुंधूकारी ने उसे श्रवण किया, तब उसका उद्धार हुआ। इससे यह सिद्ध होता है कि भागवत कथा का श्रवण मोक्षदायक है। महाराज ने कलयुग के प्रभावों का वर्णन करते हुए कहा कि भागवत में कलयुग का वास चार स्थानों पर बताया गया है स्वर्ण (सोना), जुआ, मदिरा और बाजारू स्त्रियां। इनसे दूर रहकर ही मनुष्य अपने जीवन को शुद्ध और सफल बना सकता है। उन्होंने संगीत और शास्त्रों के महत्व को जोड़ते हुए कहा कि जैसे संगीत में सात स्वर होते हैं और शास्त्रों में सप्त सरोवरों का महत्व है, उसी प्रकार भागवत कथा भी सात दिनों तक की जाती है, जिसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है। अंत में महाराज ने कहा कि आज के समय में बच्चों को सही दिशा देना अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों पर उचित नियंत्रण रखें, उन्हें अच्छे संस्कार दें और विशेष रूप से बेटियों को उत्तम शिक्षा प्रदान करें। वर्तमान समय में युवाओं का नशे की ओर बढ़ना चिंता का विषय है, जिससे बचाने के लिए परिवार और समाज दोनों को जागरूक होना होगा।
संयोजक विठ्ठल वैष्णव ने बताया कि कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति भाव से कथा का श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

By Udaipurviews

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