उदयपुर। विश्व पृथ्वी दिवस के उपलक्ष्य में विज्ञान भारती, उदयपुर इकाई-चित्तौड़ प्रान्त द्वारा विवेकानंद हॉल, विज्ञान महाविद्यालय, उदयपुर में “भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रकृति संरक्षण” विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया।
विशिष्ट वक्ता डॉ. धर्मेंद्र सिंह, सह-प्रान्त प्रचारक, चित्तौड़ प्रान्त ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन के सह-अस्तित्व और संतुलन का आधार माना गया है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और सतत विकास के संदर्भ में प्राचीन भारतीय चिंतन की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म आधारित जीवन शैली अपनाकर पेड़, पानी और प्लास्टिक के प्रति सजगता रखना आवश्यक है तथा पृथ्वी को भोग-विलास का साधन न मानकर अपने आचरण में संयम और उदारता लानी होगी।
मुख्य वक्ता (आईएफएस), डीएफओ शैतान सिंह देवड़ा ने कहा कि पृथ्वी संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने जल-संरक्षण, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देते हुए थ्री आरकृरिड्यूस, रियूज़ एवं रिसाइकिल को अपनाने का संदेश दिया। साथ ही उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 की थीम “हमारा ग्रह, हमारी शक्ति” है और पृथ्वी के प्रति सदैव आदर एवं कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।
विज्ञान भारती के मुख्य संरक्षक प्रो. एम.एल. कालरा ने कहा कि भारतीय विज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय एवं संतुलन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत के योगदान को ध्यान में रखते हुए प्रकृति संरक्षण के प्रति सजग रहने का आह्वान किया।
भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रकृति संरक्षण विषय पर हुआ व्याख्यान
