आचार्य सम्राट आनंदऋषि जी म.सा.की जन्म जयंती एवं महासती श्री नानू कुंवर जी म.सा. की पुण्यतिथि पर गुणानुवाद सभा का आयोजन

महापुरुषों के प्रसंग हमें प्रेरणा देते हैं : महासती विजयलक्ष्मी
उदयपुर, 24 जुलाई। श्री हुक्मगच्छीय साधुमार्गी स्थानकवासी जैन श्रावक संस्थान के तत्वावधान में केशवनगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मास कर रही महासती विजयलक्ष्मी जी म.सा. की निश्रा में शुक्रवार को आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी म.सा. की जन्म जयंती एवं महासती श्री नानू कुंवर जी म.सा. की पुण्यतिथि पर गुणानुवाद सभा का आयोजन किया गया।
श्रीसंघ अध्यक्ष इंदर सिंह मेहता ने बताया कि आचार्य सम्राट आनंदऋषि जी म.सा. की जन्म जयंती एवं महासती श्री नानू कुंवर जी म.सा. की पुण्यतिथि पर गुणानुवाद सभा के अवसर पर श्रीसंघ द्वारा नीवी का आयोजन किया गया, जिसमें 40 तपस्वियों ने नीवी तप की आराधना की। गुणानुवाद सभा को सम्बोधित करते हुए महासती श्री विजयलक्ष्मी जी म.सा. ने कहा कि महापुरुषों के प्रसंग हमें प्रेरणा देते हैं। आचार्य सम्राट आनंद ऋषि जी महाराज साहब की जन्म जयंती पर आपने कहा कि वे सरल, सौम्य, विद्वान, करुणाशील एवं 13 भाषाओं के ज्ञाता थे। उन्होंने अप्रमत्त जीवन जिया, उन्होंने शिक्षा एवं करुणा को बढ़ावा देने वाले जनहित के अनेक कार्य करवाए। आज ही के दिन इस भौतिक संसार को अलविदा कह देने वाली मरुधरासिंहनी महासती नानू कुंवर जी म.सा. के संपूर्ण जीवन पर प्रकाश डाला एवं कहा कि महासती श्री नानू कुंवर जी में साहस व निडरता कूट-कूट कर भरी थी। अपने प्रमाद को त्याग कर वे विदुषी बनी और अनेकों के लिए तिरण-तारण की जहाज बनी। उन्होंने कहा कि जो बड़ों की बात को अंतर में उतार लेते हैं उनके जीवन का विकास हो जाता है। संसारी तो आधि, व्याधि और उपाधि में जीता है जबकि संत समाधि में जीता है। इससे पूर्व महासती श्री सिद्धिश्री जी म.सा. ने कहा कि असंयमी व्यक्ति का जीवन वन के समान, मर्यादित श्रावक का जीवन उपवन के समान एवं संयमी का जीवन नंदनवन के समान होता है। हम भी छोटे-छोटे त्याग कर अपने जीवन को मर्यादित बनाएं। मंत्री पुष्पेन्द्र बड़ाला ने बताया कि आज के  दोनों विशेष प्रसंग के उपलक्ष में श्रीसंघ द्वारा नीवि तप का आयोजन किया गया जिसके तहत 40 श्रद्धालुओं ने नीवि तप किया, जिसके लाभार्थी डॉ. हंसा नरेन्द्र हिंगड़ रहे। सभी तपस्वियों को श्रीसंघ की ओर से प्रभावना भी दी गई।

बच्चों में संस्कार, सभ्यता और संस्कृति का वकास आज की महत्ती आवश्यकता : जिनेन्द्र मुनि
उदयपुर, 25 जुलाई। श्री वर्धमान गुरू पुष्कर ध्यान केन्द्र के तत्वावधान में दूधिया गणेश जी स्थित स्थानक में चातुर्मास कर रहे महाश्रमण काव्यतीर्थ श्री जिनेन्द्र मुनि जी म.सा. ने शुक्रवार को धर्मसभा में कहा कि बच्चों में संस्कार, सभ्यता और संस्कृति का विकास समय की महत्ती आवश्यकता है। मेल-मिलाप, संगठन और धर्म के प्रति आस्था ही जीवन की दिशा तय करती है। आज की पीढ़ी को जैन धर्म की शिक्षा और मूल्यों से जोड़ना अत्यंत जरूरी है। संघर्ष की घड़ी में प्रभु के प्रति श्रद्धा ही सम्बल बनती है और जितनी हमारी श्रद्धा दृढ़ होगी उतने ही हम प्रतिकूल परिस्थितियों को आसानी से पार कर जाएंगे। वर्तमान पीढ़ी प्रतिकूल परिस्थितियों में शीघ्र व्यथित हो जाती है। प्रभु पर विश्वास रखें और हमेशा ये ही विचार करें कि जो होगा अच्छा ही होगा। भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करते हैं जो हो रहा है वो हमारे कर्मों का परिणाम है। इसलिए प्रभु पर पूरी श्रद्धा रखें। धर्मसभा को रविन्द्र मुनि जी म.सा. ने भी सम्बोधित किया। केन्द्र अध्यक्ष निर्मल पोखरना ने बताया कि आज प्रातः साढ़े आठ से साढ़े नौ बजे तक एकघंटे का सामूहिक नवकार महामंत्र का जाप किया गया, जिसमें काफी श्रद्धालुओं ने भाग लिया। वहीं तपस्वी काजल तलेसरा व दिव्या छाजेड़ के उपवास की लड़ी में उनका बहुमान किया गया। वहीं एकासन, आयम्बिल, उपवास आदि तपस्याओं की झड़ी लगी हुई है। बाहर से दर्शनार्थियों के आने का क्रम निरन्तर बना हुआ है।

By Udaipurviews

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