उदयपुर, 11 सितम्बर। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में बुधवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि ये शरीर इन्द्रियों से चलता है, इन्द्रियां चलती हैं मन से, मन चलता है इच्छा से और इच्छा चलती है उत्साह से। यदि जीवन को उत्सवमय बनाना है तो उत्साह से अनुप्राणित रहें। जीवन में उत्साह होता है तो पंगु के पांव पहाड़ चढ़ जाते हैं, अंधे को आंख मिल जाती है, बहरे को श्रवण शक्ति मिल जाती है और गूंगा बोलने लग जाता है। आज के इस समय में संत-सती प्रभु के प्रतिरूप हैं। इनकी सेवा व सत्संग करें। सभी चाहते हैं कि हमारा जीवन आबाद हो। ज्ञानीजन फरमाते हैं कि अगर आपको शक्ति मिली है तो इसे आसक्ति में नहीं विरक्ति में लगाओ। समय सीमित है, शक्ति सीमित और आयु और भी सीमित है। समय आने पर आयु पूर्ण हो जाती है। अपने वीर्य को अर्थात् शक्ति को पहचानो। सांसारिक क्षेत्र में व्यक्ति स्वयं को शक्तिविहीन नहीं मानता पर धार्मिक क्षेत्र में शक्तिहीन मानता है। व्यवहार जगत में शक्तिशाली की आसक्ति भोग में ज्यादा होती है और शक्तिहीन आकांक्षापूर्ति में जीवन बर्बाद कर देते हैं। अगर आप आत्मविश्वास के साथ कार्य का प्रारम्भ करते हैं तो मंजिल को पा लिया जाता है। धर्म जिया जाता है, कर्म किया जाता है व उत्साह पाया जाता है। गुरू हमारी सुषुप्त शक्तियों को जगाते हैं। उत्साह से किया गया कार्य साधना, आनंद बन जाता है। अपने उत्साह को ठंडा न पड़ने दें अन्यथा गति मंद हो जाएगी। इससे पूर्व श्रद्धेय श्री रत्नेश मुनि जी म.सा. एवं विशालप्रिय जी म.सा. ने भी धर्मसभा को संबोधित किया। श्रीसंघ मंत्री पुष्पेन्द्र बड़ाला ने बताया कि आज दिल्ली, मुम्बई, किशनगढ़, डोंडीलोहारा, बैंगलोर, चैन्नई, मालवा व मेवाड़ के विभिन्न अंचलों के दर्शनार्थियों का आवागमन जारी है।
उत्साह से किया गया कार्य साधना, आनंद बन जाता है : आचार्य विजयराज
