उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में सोमवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर ने आत्मा को परमात्मा तक पहुंचाने की प्रक्रिया बताई और चतुर्विध संघ की स्थापना की। संसार के प्रत्येक जीव को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। हम जीवनभर दूसरों को जानने और समझने में लगे रहते हैं, लेकिन स्वयं के स्वरूप से अनजान रहते हैं। परमात्मा के दर्शन का उद्देश्य भी आत्मिक स्वरूप को समझना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना है।
साध्वीश्री ने उपादान और निमित्त की व्याख्या करते हुए कहा कि किसी भी कार्य की सफलता के लिए दोनों आवश्यक हैं। निमित्त का अर्थ बाहरी परिस्थितियों और व्यवस्थाओं से है, जबकि उपादान कार्य की आंतरिक योग्यता एवं सामर्थ्य से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति जिस संगति में रहता है, उसका प्रभाव उसके जीवन पर अवश्य पड़ता है। मित्रों के गुणों के साथ उनके दुर्गुण भी व्यक्ति के व्यवहार में उतर सकते हैं। किसी बात को बार-बार सुनने से भी उसका प्रभाव मन और विचारों पर पड़ता है।
जैसी संगति, वैसा जीवनःबच्चों के संस्कारों की रक्षा के लिए स्कूल के वातावरण पर दें ध्यान- साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
