लक्ष्यहीन नहीं, उद्देश्यपूर्ण हो जीवन की यात्रा; आत्मशुद्धि को बनाएं जीवन का संकल्प
उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में पर्युषण पर्व के उपरांत मंगलवार को नियमित व्याख्यान का आयोजन हुआ। श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि पर्युषण महापर्व आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र बनाने का महत्वपूर्ण अवसर है। यह वह समय है, जब व्यक्ति बाहरी संसार से हटकर अपने भीतर झांकता है और स्वयं का आत्मावलोकन करता है।
साध्वीश्री ने कहा कि पर्युषण से पहले और बाद में अपने भीतर आए परिवर्तन को प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं जांचना चाहिए। हमारी चेतना, आदतों और व्यवहार में कितना बदलाव आया, यह देखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार स्नान के बाद शरीर में स्फूर्ति और ताजगी का अनुभव होता है, उसी प्रकार संवत्सरी के प्रतिक्रमण के बाद मन और आत्मा में भी नई ऊर्जा एवं निर्मलता का अनुभव होना चाहिए। यदि ऐसा परिवर्तन दिखाई नहीं देता तो समझना चाहिए कि पर्युषण केवल एक पड़ाव बनकर रह गया।
उन्होंने कहा कि जीवन की यात्रा हमेशा उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए। लक्ष्य के बिना उठाया गया कदम व्यक्ति को सही दिशा में नहीं ले जा सकता। उन्होंने जीवन की चार यात्राओं स्वप्न यात्रा, संस्मरण यात्रा, सामर्थ्य यात्रा और समाधान यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह इनमें से किस यात्रा पर चल रहा है।
साध्वीश्री ने कहा कि सपने केवल धन, वैभव और सांसारिक उपलब्धियों के नहीं होने चाहिए, बल्कि आत्मा और अध्यात्म की उन्नति के भी होने चाहिए। यदि इस वर्ष लोभ अधिक है तो अगले वर्ष उसे कम करने का संकल्प होना चाहिए। वास्तविक आनंद बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर निहित है।
उन्होंने कहा कि परमात्मा ने जीवन में मन, शरीर और आत्मा तीनों के संतुलन का मार्ग बताया है। आत्मकल्याण के लिए मन और शरीर के साथ आत्मा की शुद्धि पर भी ध्यान देना आवश्यक है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
पर्युषण के बाद खुद से पूछें कि मेरे जीवन में कितना बदलाव आयाःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
