उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में पर्युषण पर्व के समापन के बाद सोमवार से नियमित व्याख्यानमाला का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने कहा कि पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि और संयम साधना का अवसर है। परमात्मा के शासन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को इस दौरान स्वयं को संयमित करने का अवसर मिलता है।
उन्होंने कहा कि साधना के लिए हमेशा मन के अनुकूल नहीं, बल्कि साधना के अनुकूल वातावरण आवश्यक होता है और दादाबाड़ी में ऐसा वातावरण प्राप्त हुआ है। क्षमापना पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि सामान्यतः हम उन्हीं लोगों से क्षमा मांगते हैं, जिनसे हमारा आत्मीय भाव होता है, लेकिन वास्तविक क्षमापना तब सार्थक है, जब मन में किसी के प्रति आग्रह या कटुता हो और हम उसे दूर कर हृदय से संबंध जोड़ें।
साध्वीश्री ने कहा कि “पुल जोड़ने का काम करता है और संवत्सरी भी एक ऐसा ही पुल है, जो टूटे रिश्तों को जोड़ने का अवसर देता है।” कैंची अलग करती है, जबकि सुई जोड़ती है। जीवन में अलग होने के अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन जुड़ने का सबसे बड़ा कारण अपनी आत्मिक शांति है।
उन्होंने कहा कि जिसके पास क्षमा है, वह परम सुखी है, जबकि क्रोध व्यक्ति को भीतर से दुखी करता है। इसलिए दुनिया क्या कहती है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हमारा मन क्या कहता है। अपने मन की शांति के लिए रिश्तों को जोड़ना ही सच्ची क्षमापना है।
इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।
क्षमापना पर्व टूटे रिश्तों को जोड़ने वाला सेतु : साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी
