उदयपुर, 9 सितम्बर। नारायण सेवा संस्थान में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने भगवान गणेश से जुड़े प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से जीवन में बुद्धि, विनम्रता, माता-पिता के सम्मान और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सफलता केवल साधनों या सामर्थ्य से नहीं, बल्कि सही दृष्टि और विवेक से मिलती है।
उन्होंने गणेश और कार्तिकेय की पृथ्वी परिक्रमा की कथा सुनाते हुए बताया कि प्रथम पूज्य बनने के लिए दोनों भाइयों के समक्ष पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने की शर्त रखी गई। कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, जबकि गणेश जी ने परिस्थिति को समझते हुए माता-पिता को ही अपना संपूर्ण संसार माना और उनकी सात परिक्रमा कर ली। उनका तर्क था कि माता-पिता ही वह आधार हैं, जिन्होंने जीवन दिया और धारण किया। उनकी बुद्धिमत्ता को देखते हुए भगवान शंकर ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि इस प्रसंग की सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि कई बार हम समाधान खोजने के लिए दूर-दूर तक भटकते हैं, जबकि जरूरी उत्तर हमारे सामने ही मौजूद होता है। माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा तीर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार और सेवा भावना में दिखाई दे।
कथा में गणेश जी और तुलसी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने ‘न’ कहने के सही तरीके पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गणेश जी ने तुलसी के विवाह प्रस्ताव को विनम्रता से अस्वीकार किया, जिसके बाद तुलसी ने उन्हें शाप दिया। गणेश जी ने प्रतिशोध लेने के बजाय शाप को स्वीकार किया और तुलसी को वरदान भी दिया। उन्होंने कहा कि किसी प्रस्ताव को अस्वीकार करना गलत नहीं है, लेकिन इनकार का तरीका सामने वाले के सम्मान को बनाए रखने वाला होना चाहिए। कथा के दौरान इलाज ले रहे भारत भर से आए दिव्यांग एवं परिजन मौजूद रहे।
उन्होंने गणेश और कार्तिकेय की पृथ्वी परिक्रमा की कथा सुनाते हुए बताया कि प्रथम पूज्य बनने के लिए दोनों भाइयों के समक्ष पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने की शर्त रखी गई। कार्तिकेय अपने मयूर पर सवार होकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, जबकि गणेश जी ने परिस्थिति को समझते हुए माता-पिता को ही अपना संपूर्ण संसार माना और उनकी सात परिक्रमा कर ली। उनका तर्क था कि माता-पिता ही वह आधार हैं, जिन्होंने जीवन दिया और धारण किया। उनकी बुद्धिमत्ता को देखते हुए भगवान शंकर ने उन्हें प्रथम पूज्य होने का आशीर्वाद दिया।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि इस प्रसंग की सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि कई बार हम समाधान खोजने के लिए दूर-दूर तक भटकते हैं, जबकि जरूरी उत्तर हमारे सामने ही मौजूद होता है। माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा तीर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था तभी सार्थक है, जब उसका प्रभाव हमारे व्यवहार और सेवा भावना में दिखाई दे।
कथा में गणेश जी और तुलसी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने ‘न’ कहने के सही तरीके पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गणेश जी ने तुलसी के विवाह प्रस्ताव को विनम्रता से अस्वीकार किया, जिसके बाद तुलसी ने उन्हें शाप दिया। गणेश जी ने प्रतिशोध लेने के बजाय शाप को स्वीकार किया और तुलसी को वरदान भी दिया। उन्होंने कहा कि किसी प्रस्ताव को अस्वीकार करना गलत नहीं है, लेकिन इनकार का तरीका सामने वाले के सम्मान को बनाए रखने वाला होना चाहिए। कथा के दौरान इलाज ले रहे भारत भर से आए दिव्यांग एवं परिजन मौजूद रहे।
