उदयपुर। देवेंद्रधाम स्थित महावीर समवसरण में आयोजित प्रवचन में डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने श्रावक धर्म के 12व्रतों की व्याख्या करते हुए प्रथम आवश्यकता की सर्वाेपरि महत्ता बताई और इसे समस्त धर्मों का सार रूप कहा।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को इसे विविध प्रकार से अपने जीवन में धारण करना चाहिए। मन, वचन और काया के रूप में की जाने वाली अहिंसा ही जीवन में वास्तविक फल प्रदान करती है। वर्तमान समय में शरीर के साथ वचनों से भी नशा भोगी अपेक्षाओं का प्रयोग कर मानव हिंसा का भाजक बन रहा है।
उन्होंने कहा कि घर के सदस्यों से लेकर नौकर-चाकर, व्यापार और व्यवसाय तक हर क्षेत्र में मनुष्य आवश्यकताओं का हिस्सा बनकर परकाय के शोषण का प्रयोग करता रहता है। भगवान महावीर ने वचन चुकाया के साथ-साथ मन की हिंसा की सोच तथा तपस्या को भी कर्म बंधन का कारण बताया है।
सभा में प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि द्वारा भावना के अंतर्गत मनित मरण, संसार भावना आदि का चिंतन-मनन कराया गया। उन्होंने श्रद्धालुओं से अहिंसा, संयम और आत्मचिंतन को जीवन में अपनानें का आह्वान किया।
शुभ भावनाओं से होता है कर्म निर्जरा के साथ शारीरिक स्वास्थ्य लाभ करने से तन मन में शुभ भावों का संचार होता है, जिससे कर्म निर्जरा के साथ शारीरिक स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता है। मधुर विचारों से शरीर रोग मुक्त रहता है। इसके विपरीत कटु विचारों से निरोगता प्राप्त होती है।
सिसोदिया परिवार द्वारा तेले तप का आयोजन किया. जिसमे सवा सौ भाई बहिनों ने पारना सम्पन कराया.जिसमें सवायों भाई बहनों ने पारणा सम्पन्न किया। अन्य में उपाध्याय रमेश मुनि व दीपेश मुनि द्वारा मांगलिक भावना प्रदान की गई एवं संघ के महामंत्री हिम्मत बड़ाला द्वारा आभार व्यक्त किया गया एवं चेन्नई से पधारे जैन धर्म दर्शन के विद्वान डॉ. दिलीप धीग का समाज द्वारा स्वागत एवं समाजसेवी दिनेश चौरडिया द्वारा चातुर्मासिक दानदाताओं का आभार ज्ञापित किया गया।
अहिंसा का आचरण ही जीवन को बनाता है सार्थकःडॉ. सुरेन्द्र मुनि
