विकास के साथ प्रकृति संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच संतुलन पर जोर
वैध खनन, अवैध खनन पर कार्रवाई, फ्लोरा-फौना संरक्षण और बंद खदानों के पुनर्विकास पर मिले सुझाव
उदयपुर, 10 अगस्त। अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण एवं सतत विकास को लेकर सोमवार को जिला परिषद सभागार में व्यापक जन संवाद आयोजित हुआ। माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशन में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) की महानिदेशक श्रीमती कंचन देवी की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय समिति ने जनप्रतिनिधियों, खनन पट्टा धारकों, स्वयंसेवी संगठनों, पर्यावरणविदों, पशुपालकों एवं विभिन्न हितधारकों से अरावली संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से परामर्श किया।
संवाद के दौरान हितधारकों ने अरावली के पर्यावरणीय, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व को रेखांकित करते हुए इसके संरक्षण के लिए व्यावहारिक और प्रभावी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता जताई। साथ ही अरावली संरक्षण के प्रयासों में स्थानीय समुदायों की आजीविका, रोजगार, पशुपालन और क्षेत्र के समग्र विकास को भी ध्यान में रखे जाने पर बल दिया।
अरावली हमारी धरोहर, संरक्षण के साथ स्थानीय हितों का भी ध्यान जरूरी – विधायक जैन
संवाद कार्यक्रम में उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन ने कहा कि अरावली हमारी प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है और इसका संरक्षण बेहद आवश्यक है। उन्होंने बताया कि वैध रूप से अरावली के लगभग एक प्रतिशत क्षेत्र में ही खनन हो रहा है, जिससे सरकार को 6 हजार 500 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हो रहा है तथा हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। उन्होंने कहा कि वैध गतिविधियों और अवैध खनन के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए अवैध खनन करने वालों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए।
खनन प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं का हो समाधान – विधायक मीणा
उदयपुर ग्रामीण विधायक श्री फूलसिंह मीणा ने कहा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान भी अरावली संरक्षण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि बंद पड़ी खदानों का उपयोग हरियाली विकास एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों के लिए किया जा सकता है। इससे अनुपयोगी क्षेत्रों का पुनर्विकास करते हुए पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत किया जा सकेगा।
अरावली के ऐतिहासिक महत्व को संरक्षित करना जरूरी – विधायक मेवाड़
मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार के सदस्य एवं नाथद्वारा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़ ने अरावली पर्वत श्रृंखला के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अरावली केवल एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि क्षेत्र की सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने इसके संरक्षण के लिए ठोस, प्रभावी एवं दीर्घकालिक कदम उठाए जाने की आवश्यकता बताई। पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल ने अरावली क्षेत्र में रेत के अवैध खनन पर प्रभावी रोक लगाने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि अरावली का संरक्षण किसी एक विभाग या संस्था के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि सरकार, स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरणविदों और अन्य हितधारकों के समन्वित प्रयासों से ही इसके संरक्षण का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
फ्लोरा-फौना संरक्षण और पशुपालन से जुड़ी चिंताओं पर भी चर्चा
जन संवाद के दौरान विभिन्न हितधारकों ने अरावली क्षेत्र की जैव विविधता, फ्लोरा एवं फौना के संरक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पशुपालन से जुड़े लोगों ने अपनी चिंताओं और व्यावहारिक समस्याओं से समिति को अवगत कराया। हितधारकों ने कहा कि अरावली के संरक्षण की नीतियां तैयार करते समय स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ-साथ सदियों से इस क्षेत्र पर निर्भर समुदायों की आवश्यकताओं को भी समझना जरूरी है।
हितधारकों ने कहा कि विकास के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण भी आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका दोनों को साथ लेकर चलने वाला संतुलित एवं व्यावहारिक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। कुछ हितधारकों ने बताया कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में वैध खनन गतिविधियों से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है तथा इससे लोगों के पलायन को रोकने में भी मदद मिली है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के सामाजिक एवं आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए अरावली संरक्षण की नीतियां तैयार की जानी चाहिए।
न्यायिक दृष्टिकोण के साथ ही समावेशी संरक्षण हो व्याख्या में शामिल
हितधारकों ने समिति के समक्ष यह भी सुझाव रखा कि अरावली संरक्षण की व्याख्या न्यायिक दृष्टिकोण के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों, पर्यावरणीय आवश्यकताओं, ऐतिहासिक महत्व और आजीविका के पहलुओं को समाहित करते हुए की जानी चाहिए।जन संवाद में अरावली के संरक्षण को लेकर तकनीकी, पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक पहलुओं पर व्यापक सुझाव प्राप्त हुए।
इस अवसर पर समिति सदस्य एवं भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष आशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़ सहित अन्य सदस्य, प्रधान मुख्य वन संरक्षक टेरिटोरियल एस.आर. यादव, जिला कलेक्टर गौरव अग्रवाल, एडीएम सिटी जितेंद्र ओझा सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि तथा उदयपुर सहित विभिन्न जिलों से आए बड़ी संख्या में हितधारक उपस्थित रहे।
