– दशवैकालिक आगम साधु जीवन का आधार, चौदह पूर्व का सार है : आचार्य मुक्तिसागर
– ज्ञान भक्ति एवं आगम पूजा के साथ श्रद्धालुओं ने लिया धर्मलाभ
उदयपुर, 6 अगस्त। तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ जैन तीर्थ में मालव मार्तंड आचार्य भगवंत मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज, आचार्य अचल मुक्तिसागर सूरीश्वर महाराज सहित ठाणा-4 के सान्निध्य में चातुर्मास महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं धार्मिक उल्लास के साथ जारी है।
महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि गुरुवार से 42 दिवसीय सम्मेत शिखर महातीर्थ तप आराधना का शुभारंभ हुआ। आत्म वल्लभ सभागार में प्रातः: 7 बजे संतों के सानिध्य में ज्ञान भक्ति, ज्ञान पूजा एवं अष्टप्रकारी पूजा-अर्चना सम्पन्न हुई। इस दौरान सभी श्रावक-श्राविकाओं ने जैन आगम ग्रंथों की विधिवत पूजा-अर्चना कर धर्म लाभ प्राप्त किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य भगवंत मुक्ति सागर सूरीश्वर महाराज ने कहा कि प्राचीन काल में जैन धर्म में चौदह पूर्वों का ज्ञान विद्यमान था, किंतु वर्तमान में केवल 45 आगम ही उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि समय के साथ शेष 44 आगम विलुप्त हो जाएंगे, लेकिन दशवैकालिक आगम का अस्तित्व बना रहेगा। यह ग्रंथ साधु जीवन के आचार, विचार, अनुशासन और संयम का मूल आधार है। आचार्यश्री ने कहा कि दशवैकालिक आगम चौदह पूर्वों का सार है। उन्होंने इसकी महत्ता समझाते हुए कहा कि जैसे हजारों फूलों से थोड़ी-सी इत्र, अनेक क्विंटल गन्ने के रस से थोड़ी-सी शक्कर और बहुत अधिक दूध से थोड़ा-सा घी बनता है, वैसे ही दशवैकालिक समस्त आगम ज्ञान का सार है। सार होने के कारण उसमें ज्ञान की गहनता और महत्ता अधिक होती है। उन्होंने बताया कि दशवैकालिक सूत्र के प्रथम चार अध्यायों का अर्थ सहित अध्ययन किए बिना बड़ी दीक्षा नहीं दी जाती। पांचवें अध्याय का अध्ययन किए बिना साधु-साध्वियां गोचरी के लिए नहीं जा सकते, जबकि सातवें अध्याय के अर्थ एवं अभ्यास के बाद ही उन्हें प्रवचन देने का अधिकार प्राप्त होता है। सातवें अध्याय में क्या बोलना, कैसे बोलना, कब बोलना और कितना बोलना—इन सभी बातों का विस्तृत मार्गदर्शन मिलता है। इसलिए साधु जीवन में दशवैकालिक का अध्ययन अत्यंत आवश्यक और अनिवार्य माना गया है।
इस अवसर पर कुलदीप नाहर, भोपाल सिंह नाहर, अशोक जैन, राजेन्द्र जवेरिया, प्रकाश नागोरी, हेमंत सिंघवी, राजेश जवेरिया, दिनेश बापना, भोपाल सिंह परमार, अभय नलवाया, कैलाश मुर्डिया, चतर सिंह पामेच, सतीश कच्छारा, दिनेश भंडारी, चिमनलाल गांधी, प्रद्योत महात्मा, रमेश सिरोया, कुलदीप मेहता सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने धर्मसभा में उपस्थित होकर तप आराधना एवं आगम पूजा का लाभ प्राप्त किया।
आयड़ जैन तीर्थ में 42 दिवसीय सम्मेत शिखर महातीर्थ तप आराधना का शुभारंभ
